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anupam shah
chup rahkar suljhaa paao to ghussa hokar mat dikhlaana
chup rahkar suljhaa paao to ghussa hokar mat dikhlaana | चुप रहकर सुलझा पाओ तो ग़ुस्सा होकर मत दिखलाना
- anupam shah
चुप
रहकर
सुलझा
पाओ
तो
ग़ुस्सा
होकर
मत
दिखलाना
परदों
से
गर
काम
बने
तो
दीवारों
को
मत
खिंचवाना
- anupam shah
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भले
ही
जान-लेवा
हो
सियासत
को
ग़लत
कहना
मगर
फिर
भी
ये
सच
ईमान
वाले
लोग
कहते
हैं
Amaan Pathan
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ख़मोशी
मेरी
मअनी-ख़ेज़
थी
ऐ
आरज़ू
कितनी
कि
जिस
ने
जैसा
चाहा
वैसा
अफ़्साना
बना
डाला
Arzoo Lakhnavi
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चुप
रहते
हैं
चुप
रहने
दो
राज़
बताओ
खोले
क्या
बात
वफ़ा
की
तुम
करती
हो
बोलो
हम
कुछ
बोले
क्या
उल्फ़त
तो
अफ़साना
है
तुम
करती
खूब
सियासत
हो
हम
भी
हैं
मक़बूल
बहुत
अब
बोल
किसी
के
होलें
क्या
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Anand Raj Singh
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बुरा
मनाया
था
हर
आहट
हर
सरगोशी
का
सोचो
कितना
ध्यान
रखा
उसने
ख़ामोशी
का
तुम
इसका
नुक़सान
बताती
अच्छी
लगती
हो
वरना
हम
को
शौक़
नहीं
है
सिगरेट-नोशी
का
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Khurram Afaq
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कितनी
लंबी
ख़ामोशी
से
गुज़रा
हूँ
उन
से
कितना
कुछ
कहने
की
कोशिश
की
Gulzar
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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मेरे
होंटों
पे
ख़ामुशी
है
बहुत
इन
गुलाबों
पे
तितलियाँ
रख
दे
Shakeel Azmi
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ग़लत
बातों
को
ख़ामोशी
से
सुनना
हामी
भर
लेना
बहुत
हैं
फ़ाएदे
इस
में
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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अरे
मैं
इंतिक़ामन
रो
रहा
हूँ
मैं
चुप
हो
जाऊँगा
उसको
रुला
के
Swapnil Tiwari
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इज़हार
पे
भारी
है
ख़मोशी
का
तकल्लुम
हर्फ़ों
की
ज़बाँ
और
है
आँखों
की
ज़बाँ
और
Haneef akhgar
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अभी
सिक्का
हवा
में
है
तो
फ़ैसला
कर
लो
ज़मीं
पे
गिर
गया
अगर
तो
फ़ैसला
कैसा
anupam shah
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शोर
की
जब
ये
आदत
हमें
हो
गई
बज़्म
तन्हा
हमें
कर
के
ख़ुद
सो
गई
सब
सेे
मिलता
रहा
नाम
लेकर
तेरा
ये
ख़ता
मुझ
सेे
सौ
मर्तबा
हो
गई
टूटकर
के
मैं
सच
को
दिखाता
रहा
आइनो
सी
मेरी
ज़िन्दगी
हो
गई
उसकी
इक
मुस्कुराहट
को
तड़पे
बहुत
वो
ख़फ़ा
जब
हुई
आप
ही
रो
गई
एक
तितली
जो
थी
फूल
पर
बस
फ़िदा
उड़
गईं
खुशबुएँ
बे-वफ़ा
हो
गई
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anupam shah
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ज़िन्दगी
इस
तरह
ही
लुटाता
रहा
प्यार
खोता
रहा
प्यार
पाता
रहा
एक
मंज़र
ने
यूँँ
रोक
दी
ज़िंदगी
बारहा
सामने
मेरे
आता
रहा
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anupam shah
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कुछ
दीवारों
पर
दरवाज़े
होते
हैं
कुछ
दरवाज़े
दीवारों
से
होते
हैं
anupam shah
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ता'उम्र
वही
राज़
छुपाते
ही
रहे
हम
ता'उम्र
निगाहों
से
छलकता
ही
रहा
जो
anupam shah
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