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anupam shah
baad tere sukoon talash kiya
baad tere sukoon talash kiya | बाद तेरे सुकूँ तलाश किया
- anupam shah
बाद
तेरे
सुकूँ
तलाश
किया
हमको
हर
शय
ने
फिर
हताश
किया
कुछ
को
कांधा
दिया
लहू
कुछ
को
हमने
हर
चीड़
को
पलाश
किया
- anupam shah
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इसीलिए
मैं
बिछड़ने
पर
सोगवार
नहीं,
सुकून
पहली
ज़रूरत
है,
तेरा
प्यार
नहीं!
जवाब
ढ़ूंढ़ने
में
उम्र
मत
गँवा
देना,
सवाल
करती
है
दुनिया
पर
एतबार
नहीं
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Balmohan Pandey
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बे
तेरे
क्या
वहशत
हम
को
तुझ
बिन
कैसा
सब्र-ओ-सुकूँ
तू
ही
अपना
शहर
है
जानी
तू
ही
अपना
सहरा
है
Ibn E Insha
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दिल
की
चोटों
ने
कभी
चैन
से
रहने
न
दिया
जब
चली
सर्द
हवा
मैं
ने
तुझे
याद
किया
Josh Malihabadi
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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न
तीर्थ
जा
कर
न
धर्म
ग्रंथो
का
सार
पा
कर
सुकूँ
मिला
है
मुझे
तो
बस
तेरा
प्यार
पा
कर
ग़रीब
बच्चे
किताब
पढ़
कर
सँवर
रहे
हैं
अमीर
लड़के
बिगड़
रहे
हैं
दुलार
पा
कर
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Alankrat Srivastava
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मुसीबतों
में
तो
याद
करते
ही
हैं
किसी
को
ये
लोग
सारे
मगर
कभी
जो
सुकूँ
में
आए
ख़याल
मेरा
तो
लौट
आना
Hasan Raqim
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सिवाए
तालियों
के
कुछ
नहीं
मिलता
ग़ज़लगोई
फ़क़त
धंधा
सुकूँ
का
है
Neeraj Neer
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इतना
तो
ज़िन्दगी
में
किसी
के
ख़लल
पड़े
हँसने
से
हो
सुकून
न
रोने
से
कल
पड़े
जिस
तरह
हँस
रहा
हूँ
मैं
पी
पी
के
गर्म
अश्क
यूँँ
दूसरा
हँसे
तो
कलेजा
निकल
पड़े
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Kaifi Azmi
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दिल्ली
से
हम
ही
बोला
करें
अम्न
की
बोली
यारो
तुम
भी
कभी
लाहौर
से
बोलो
Rahat Indori
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जौन
तुम्हें
ये
दौर
मुबारक,
दूर
ग़म-ए-अय्याम
से
हो
एक
पागल
लड़की
को
भुला
कर
अब
तो
बड़े
आराम
से
हो
Jaun Elia
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आँख
के
मोतियों
को
न
ज़ाया'
करो
अश्क़
यूँँ
ही
न
अपने
बहाएा
करो
खलवतों
में
है
जीने
की
बस
ये
अदा
आइना
देखकर
मुस्कुराया
करो
लिख
दिया
चाँद
को
तुमने
क्यूँ
दिल
मिरा
चाँद
को
इतना
सर
न
चढ़ाया
करो
बांधकर
उँगलियों
से
मेरी
उंगलियां
प्यार
बढ़ता
है
इसको
बढ़ाया
करो
जोड़कर
ज़िन्दगी
से
मेरी
ज़िंदगी
जो
है
आधा
उसे
तुम
सवाया
करो
बात
करने
का
है
इक
सलीक़ा
यही
एक
सुन
कर
के
दूजी
सुनाया
करो
यूँँ
करो
संग
मेरे
ज़रा
सा
चलो
इस
तरह
से
न
हमको
पराया
करो
आपके
लब
प'
है
मिस्रियों
की
डली
कोई
वा'दा
करो
तो
निभाया
करो
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anupam shah
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हैं
जो
बातें
ये
बस
ख़याली
हैं
और
फिर
हाथ
भी
तो
ख़ाली
हैं
anupam shah
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मुहब्बत
में
निगाहों
को
ज़बाँ
कैसे
किया
जाए
जो
तुम
में
है
निहाँ
उसको
‘अयाँ
कैसे
किया
जाए
कई
बातें
हैं
दिल
में
तुम
सेे
कहने
को
मगर
कैसे
जो
अब
तक
कह
नहीं
पाए
बयाँ
कैसे
किया
जाए
मुसलसल
ज़िंदगी
में
और
भी
कुछ
दर्द
हैं
ऐसे
तुम्हीं
को
एक
अपना
सब
जहाँ
कैसे
किया
जाए
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anupam shah
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आजकल
का
आब-ओ-दाना
और
है
जो
हुआ
उसका
बताना
और
है
दिल-लगी
करना
सताना
और
है
इश्क़
लेना
घर
बसाना
और
है
क़हक़हों
का
शोर
है
चारों
तरफ़
चल
रहा
दिल
में
तराना
और
है
ये
वफ़ा
या
बे-वफ़ाई
सा
नहीं
आपका
नज़रें
चुराना
और
है
कश्तियों
में
पाँव
धोना
और
है
बीच
में
फिर
डूब
जाना
और
है
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anupam shah
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सुलझाऊँ
तेरी
ज़ुल्फ़
से
हाथों
की
लकीरें
ये
काम
मगर
मुझ
सेे
अकेले
नहीं
होगा
anupam shah
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