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Rashid barabankvi
ibne aadam kii khushi ke vaaste
ibne aadam kii khushi ke vaaste | इब्ने आदम की ख़ुशी के वास्ते
- Rashid barabankvi
इब्ने
आदम
की
ख़ुशी
के
वास्ते
हम
परिंदे
तीर
खा
कर
मर
गए
- Rashid barabankvi
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बस
एक
मैं
था
जिस
सेे
सच
मुच
में
दिलबरी
की
वरना
हर
आदमी
से
उसने
दो
नंबरी
की
जिस
बात
में
भी
हमने
ख़ुद
को
अकेला
रक्खा
बाग़ात
में
भी
हमने
जोड़ों
की
मुख़बरी
की
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Muzdum Khan
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इश्क़
ने
'ग़ालिब'
निकम्मा
कर
दिया
वर्ना
हम
भी
आदमी
थे
काम
के
Mirza Ghalib
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ऐ
आसमान
तेरे
ख़ुदा
का
नहीं
है
ख़ौफ़
डरते
हैं
ऐ
ज़मीन
तेरे
आदमी
से
हम
Unknown
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रंग
और
नस्ल
ज़ात
और
मज़हब
जो
भी
है
आदमी
से
कमतर
है
इस
हक़ीक़त
को
तुम
भी
मेरी
तरह
मान
जाओ
तो
कोई
बात
बने
Sahir Ludhianvi
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इंसान
अपने
आप
में
मजबूर
है
बहुत
कोई
नहीं
है
बे-वफ़ा
अफ़्सोस
मत
करो
Bashir Badr
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वो
मुझ
को
छोड़
के
जिस
आदमी
के
पास
गया
बराबरी
का
भी
होता
तो
सब्र
आ
जाता
Parveen Shakir
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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इक
आदमी
जो
घर
पे
कभी
हँसता
ही
नहीं
पकड़ा
गया
है
हँसता
हुआ
कैमरे
के
साथ
Shadab khan
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नस्ल-ए-आदम
रफ़्ता
रफ़्ता
ख़ुद
को
कर
लेगी
तबाह
इतनी
सख़्ती
से
क़यामत
पेश
आएगी
न
पूछ
Abhinandan pandey
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मोहब्बत
एक
ख़ुशबू
है
हमेशा
साथ
चलती
है
कोई
इंसान
तन्हाई
में
भी
तन्हा
नहीं
रहता
Bashir Badr
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आतिश-ए-ग़म
मेरे
सीने
कि
बढ़ाने
आए
उस
से
कह
दो
कि
मुझे
छोड़
के
जाने
आए
Rashid barabankvi
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रह
के
घर
में
मैं
मुक़द्दर
है
बुरा
कहता
था
देखा
फुटपाथ
तो
फिर
होश
ठिकाने
आए
Rashid barabankvi
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मुझ
को
यक़ीन
है
कि
तुझे
मुझ
से
प्यार
है
तुझ
को
नहीं
यक़ीन
तो
सिक्का
उछाल
दूँ
Rashid barabankvi
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इक
चराग़-ए-हक़
बुझाने
के
लिए
ज़ालिमों
के
सैकड़ों
लश्कर
गए
Rashid barabankvi
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