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Anmol Mishra
Jangal jangal bhatka paani
जंगल जंगल भटका पानी
- Anmol Mishra
जंगल
जंगल
भटका
पानी
एक
नदी
में
अटका
पानी
कोई
दरिया
खोज
रहा
था
बीच
गगन
में
लटका
पानी
पैर
तुम्हारे
चूम
रहा
क्यूँ
जाने
कौन
से
तट
का
पानी
उसने
पूछा
क्या
है
मुहब्बत
देख
उसे
फिर
गटका
पानी
इतनी
सुन्दर
क्या
होगा
जब
तुम
पर
पड़ेगा
घट
का
पानी
कितने
सागर
तैर
गया
पर
उन
आँखों
का
खटका
पानी
- Anmol Mishra
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जो
टूट
बैठे
थकन
के
मारे
जो
हार
बैठे
हैं
आधे
रस्ते
सुनो
ऐ
मंज़िल
ज़रा
बिचारों
के
पास
आओ
गले
लगाओ
Anmol Mishra
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आज
जवानी
ठोकर
खाकर
गिरती
है
बूढ़े
कंधे
बोझ
उठाए
चलते
हैं
Anmol Mishra
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सादे
काग़ज़
जैसा
जीवन
जीवन
जैसा
नइँ
होता
कुछ
न
सही
तो
टेढ़ी
मेढ़ी
खींच
लकीरें
काग़ज़
पर
Anmol Mishra
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ये
लाल
शा
में
ये
लाल
अंबर
ये
लाल
सूरज
चमक
रहा
है
मुझे
बता
दो
कहाँ
है
खोई
तिरे
लबों
की
ये
सुर्ख़
लाली
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Anmol Mishra
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रात
की
वहशत
को
जानो
डर
गए
बोल
लो
ख़ुद
से
कभी
लो
डर
गए
इश्क़
के
जलते
चराग़ों
क्या
हुआ
तुम
अभी
से
बुझ
रहे
हो
डर
गए
जिस्म
के
हर
मोड़
को
तो
छू
लिया
रूह
पर
भी
हाथ
रक्खो
डर
गए
झूलना
पंखे
से
चाहा
जब
कभी
देखकर
कमज़ोर
छत
को
डर
गए
मानता
हूँ
मैं
ग़लत
था
ठीक
है
आँख
से
आँखें
मिलाओ
डर
गए
रोज़
हालातों
से
हम
लड़ते
रहे
जीते
जी
वो
मर
गए
जो
डर
गए
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Anmol Mishra
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