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Anand Panday Tanha
zeest kaise haseen ho jaa.e
zeest kaise haseen ho jaa.e | ज़ीस्त कैसे हसीन हो जाए
- Anand Panday Tanha
ज़ीस्त
कैसे
हसीन
हो
जाए
आदमी
जब
मशीन
हो
जाए
मुतमइन
हैं
ख़ुलूस
से
हम
तो
आप
को
बस
यक़ीन
हो
जाए
ख़्वाहिश-ए-नफ़्स
है
यही
हर
दम
साथ
इक
नाज़नीन
हो
जाए
लोग
हैं
बे-शुमार
जब
दिल
में
कैसे
मालिक
मकीन
हो
जाए
इश्क़
नादाँ
का
जब
हुआ
कामिल
फिर
कोई
क्यूँ
ज़हीन
हो
जाए
भर
गया
ज़िंदगी
से
दिल
अब
तो
मौत
शायद
मुई'न
हो
जाए
जन्म
होगा
कि
मग़्फ़िरत
होगी
फ़ैसला
अब
मुबीन
हो
जाए
कोई
'तन्हा'
ग़ज़ल
सुनाए
तो
रूह
ताज़ा-तरीन
हो
जाए
- Anand Panday Tanha
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ये
लोग
कौन
हैं
आख़िर
कहाँ
से
आते
हैं
जो
जिस्म
नोच
के
फिर
बेटियाँ
जलाते
हैं
Shajar Abbas
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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उसके
अच्छे
शे'र
नहीं
भाते
हमको
जो
अच्छा
इंसान
नहीं
बन
पाता
है
Tanoj Dadhich
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उसको
जो
कुछ
भी
कहूँ
अच्छा
बुरा
कुछ
न
करे
यार
मेरा
है
मगर
काम
मेरा
कुछ
न
करे
दूसरी
बार
भी
पड़
जाए
अगर
कुछ
करना
आदमी
पहली
मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
न
करे
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Abid Malik
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इश्क़
जब
तक
न
कर
चुके
रुस्वा
आदमी
काम
का
नहीं
होता
Jigar Moradabadi
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मैं
चीख़ता
रहा
कुछ
और
भी
है
मेरा
इलाज
मगर
ये
लोग
तुम्हारा
ही
नाम
लेते
रहे
Anjum Saleemi
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हम
लोग
चूंकि
दश्त
के
पाले
हुए
हैं
सो
ख़्वाबों
में
चाहे
झील
हों,
आँखों
में
पेड़
हैं
Siddharth Saaz
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जुदा
हुए
हैं
बहुत
लोग
एक
तुम
भी
सही
अब
इतनी
बात
पे
क्या
ज़िंदगी
हराम
करें
Nasir Kazmi
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फूल
कर
ले
निबाह
काँटों
से
आदमी
ही
न
आदमी
से
मिले
Khumar Barabankvi
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इंसाँ
की
ख़्वाहिशों
की
कोई
इंतिहा
नहीं
दो
गज़
ज़मीं
भी
चाहिए
दो
गज़
कफ़न
के
बाद
Kaifi Azmi
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मिल
चुके
हैं
गुलाब
से
पहले
आप
के
इंतिख़ाब
से
पहले
हम
तिरा
ए'तिबार
कर
लेंगे
मुतमइन
हूँ
जवाब
से
पहले
मुंतज़िर
नींद
कह
रही
है
ये
दूर
हूँ
इज़्तिराब
से
पहले
प्यार
का
भी
सबक़
ज़रूरी
है
इल्म
की
हर
किताब
से
पहले
थाम
लें
हाथ
दफ़अ'तन
उन
का
पूछना
क्या
जनाब
से
पहले
आप
में
भी
नशा
कहाँ
कम
है
काश
आते
शराब
से
पहले
तब
कहीं
वो
झलक
दिखाएगा
पाक
हो
लें
सवाब
से
पहले
जावेदाँ
कौन
है
ज़माने
में
पूछ
लें
ये
हबाब
से
पहले
ऐ
ख़ुदा
बख़्श
दे
हमें
जन्नत
दश्त
सहरा
सराब
से
पहले
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Anand Panday Tanha
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ज़ीस्त
की
यूँँ
तो
शाम
तक
पहुँचे
इश्क़
में
पर
सलाम
तक
पहुँचे
गुफ़्तुगू
जब
हुई
निगाहों
में
वस्ल
के
हम
पयाम
तक
पहुँचे
रोज़
उस
की
गली
में
ठहरें
हम
क्या
पता
कब
वो
बाम
तक
पहुँचे
आख़िरश
वो
हुए
पशेमाँ
ही
लोग
जो
इंतिक़ाम
तक
पहुँचे
क्यूँ
न
मिल
बैठ
कर
सुल्ह
कर
लें
मसअला
क्यूँ
निज़ाम
तक
पहुँचे
राज़-ए-दिल
दोस्त
से
भी
मत
कहना
क्या
पता
ये
तमाम
तक
पहुँचे
दौर
जब
इंतिख़ाब
का
आया
हुक्मराँ
तब
अवाम
तक
पहुँचे
दर्द
कुछ
और
दे
ज़माना
तो
शाइ'री
इक
मक़ाम
तक
पहुँचे
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Anand Panday Tanha
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अगर
वो
ख़ूब-सूरत
है
भली
है
हमारी
रूह
भी
तो
संदली
है
अभी
रफ़्तार
पकड़ेगी
मोहब्बत
अभी
तो
वो
दबे
पैरों
चली
है
यक़ीनन
आ
गए
हैं
बज़्म
में
वो
नहीं
तो
इस
क़दर
क्यूँ
खलबली
है
दु'आ
फिर
ग़ैब
से
माँ
ने
हमें
दी
हमारी
इक
मुसीबत
फिर
टली
है
दिखावा
है
महज़
शाइस्तगी
ये
तुम्हारी
जब
नज़र
ही
मंचली
है
अभी
मुँह
फेर
लेना
ऐ
क़ज़ा
तू
ब-मुश्किल
ज़िंदगी
फूली
फली
है
मुयस्सर
है
सभी
कुछ
ज़िंदगी
में
कमी
पर
आप
की
बे-हद
खली
है
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Anand Panday Tanha
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