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Anand Panday Tanha
mil chuke hain gulaab se pahle
mil chuke hain gulaab se pahle | मिल चुके हैं गुलाब से पहले
- Anand Panday Tanha
मिल
चुके
हैं
गुलाब
से
पहले
आप
के
इंतिख़ाब
से
पहले
हम
तिरा
ए'तिबार
कर
लेंगे
मुतमइन
हूँ
जवाब
से
पहले
मुंतज़िर
नींद
कह
रही
है
ये
दूर
हूँ
इज़्तिराब
से
पहले
प्यार
का
भी
सबक़
ज़रूरी
है
इल्म
की
हर
किताब
से
पहले
थाम
लें
हाथ
दफ़अ'तन
उन
का
पूछना
क्या
जनाब
से
पहले
आप
में
भी
नशा
कहाँ
कम
है
काश
आते
शराब
से
पहले
तब
कहीं
वो
झलक
दिखाएगा
पाक
हो
लें
सवाब
से
पहले
जावेदाँ
कौन
है
ज़माने
में
पूछ
लें
ये
हबाब
से
पहले
ऐ
ख़ुदा
बख़्श
दे
हमें
जन्नत
दश्त
सहरा
सराब
से
पहले
- Anand Panday Tanha
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कहाँ
है
तू
कि
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐ
दोस्त
तमाम
रात
सुलगते
हैं
दिल
के
वीराने
Nasir Kazmi
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ईद
के
रोज़
यही
अपनी
दु'आ
है
रब
से
मुल्क
में
अमन
का,
उलफ़त
का
बसेरा
हो
जाए
हर
परेशानी
से
हर
शख़्स
को
मिल
जाए
नजात
इस
सियह
रात
का
बस
जल्द
सवेरा
हो
जाए
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Zaki Azmi
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चमेली
रात
कह
रही
थी
मेरी
बू
लिया
करें
और
इस
सेे
जी
नहीं
भरे
तो
मुझको
छू
लिया
करें
कभी
भी
अच्छे
देवता
नहीं
बनेंगे
ऐसे
आप
चढ़ावे
में
रुपए
नहीं
फ़क़त
लहू
लिया
करें
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Azbar Safeer
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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चाँद
तारे
इक
दिया
और
रात
का
कोमल
बदन
सुब्ह-दम
बिखरे
पड़े
थे
चार
सू
मेरी
तरह
Aziz Nabeel
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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भूला
नहीं
हूँ
आज
भी
हालात
गाँव
के
हाँ,
शहर
आ
गया
हूँ
मगर
साथ
गाँव
के
दुनिया
में
मेरा
नाम
जो
रोशन
हुआ
अगर
जलने
लगेंगे
बल्ब
भी
हर
रात
गाँव
के
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Tanoj Dadhich
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इन्हीं
ग़म
की
घटाओं
से
ख़ुशी
का
चाँद
निकलेगा
अँधेरी
रात
के
पर्दे
में
दिन
की
रौशनी
भी
है
Akhtar Shirani
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तेरी
आँखों
के
लिए
इतनी
सज़ा
काफ़ी
है
आज
की
रात
मुझे
ख़्वाब
में
रोता
हुआ
देख
Abhishek shukla
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मैं
जिस
के
साथ
कई
दिन
गुज़ार
आया
हूँ
वो
मेरे
साथ
बसर
रात
क्यूँँ
नहीं
करता
Tehzeeb Hafi
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ज़ीस्त
की
यूँँ
तो
शाम
तक
पहुँचे
इश्क़
में
पर
सलाम
तक
पहुँचे
गुफ़्तुगू
जब
हुई
निगाहों
में
वस्ल
के
हम
पयाम
तक
पहुँचे
रोज़
उस
की
गली
में
ठहरें
हम
क्या
पता
कब
वो
बाम
तक
पहुँचे
आख़िरश
वो
हुए
पशेमाँ
ही
लोग
जो
इंतिक़ाम
तक
पहुँचे
क्यूँ
न
मिल
बैठ
कर
सुल्ह
कर
लें
मसअला
क्यूँ
निज़ाम
तक
पहुँचे
राज़-ए-दिल
दोस्त
से
भी
मत
कहना
क्या
पता
ये
तमाम
तक
पहुँचे
दौर
जब
इंतिख़ाब
का
आया
हुक्मराँ
तब
अवाम
तक
पहुँचे
दर्द
कुछ
और
दे
ज़माना
तो
शाइ'री
इक
मक़ाम
तक
पहुँचे
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Anand Panday Tanha
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अगर
वो
ख़ूब-सूरत
है
भली
है
हमारी
रूह
भी
तो
संदली
है
अभी
रफ़्तार
पकड़ेगी
मोहब्बत
अभी
तो
वो
दबे
पैरों
चली
है
यक़ीनन
आ
गए
हैं
बज़्म
में
वो
नहीं
तो
इस
क़दर
क्यूँ
खलबली
है
दु'आ
फिर
ग़ैब
से
माँ
ने
हमें
दी
हमारी
इक
मुसीबत
फिर
टली
है
दिखावा
है
महज़
शाइस्तगी
ये
तुम्हारी
जब
नज़र
ही
मंचली
है
अभी
मुँह
फेर
लेना
ऐ
क़ज़ा
तू
ब-मुश्किल
ज़िंदगी
फूली
फली
है
मुयस्सर
है
सभी
कुछ
ज़िंदगी
में
कमी
पर
आप
की
बे-हद
खली
है
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Anand Panday Tanha
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ज़ीस्त
कैसे
हसीन
हो
जाए
आदमी
जब
मशीन
हो
जाए
मुतमइन
हैं
ख़ुलूस
से
हम
तो
आप
को
बस
यक़ीन
हो
जाए
ख़्वाहिश-ए-नफ़्स
है
यही
हर
दम
साथ
इक
नाज़नीन
हो
जाए
लोग
हैं
बे-शुमार
जब
दिल
में
कैसे
मालिक
मकीन
हो
जाए
इश्क़
नादाँ
का
जब
हुआ
कामिल
फिर
कोई
क्यूँ
ज़हीन
हो
जाए
भर
गया
ज़िंदगी
से
दिल
अब
तो
मौत
शायद
मुई'न
हो
जाए
जन्म
होगा
कि
मग़्फ़िरत
होगी
फ़ैसला
अब
मुबीन
हो
जाए
कोई
'तन्हा'
ग़ज़ल
सुनाए
तो
रूह
ताज़ा-तरीन
हो
जाए
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Anand Panday Tanha
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