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Ammar Iqbal
jaao maatam guzaaro jaane do
jaao maatam guzaaro jaane do | जाओ मातम गुज़ारो जाने दो
- Ammar Iqbal
जाओ
मातम
गुज़ारो
जाने
दो
जिस
का
ग़म
है
उसे
मनाने
दो
बीच
से
एक
दास्ताँ
टूटी
और
फिर
बन
गए
फ़साने
दो
हम
फ़क़ीरों
को
कुछ
तो
दो
साहब
कुछ
नहीं
दे
सको
तो
ता'ने
दो
हाथ
जिस
को
लगा
नहीं
सकता
उस
को
आवाज़
तो
लगाने
दो
तुम
दिया
हो
तो
उन
पतंगों
को
कम
से
कम
रौशनी
में
आने
दो
- Ammar Iqbal
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आँख
में
नम
तक
आ
पहुँचा
हूँ
उसके
ग़म
तक
आ
पहुँचा
हूँ
पहली
बार
मुहब्बत
की
थी
आख़री
दम
तक
आ
पहुँचा
हूँ
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Khalil Ur Rehman Qamar
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अब
ये
सोचा
है
बस
ख़ुश
रहेंगे
दिल
उदासी
से
उकता
गया
है
Sapna Moolchandani
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आज
तो
बे-सबब
उदास
है
जी
इश्क़
होता
तो
कोई
बात
भी
थी
Nasir Kazmi
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जीना
मुश्किल
है
के
आसान,
ज़रा
देख
तो
लो
लोग
लगते
हैं
परेशान,
ज़रा
देख
तो
लो
इन
चराग़ों
के
तले
ऐसे
अँधेरे
क्यूँँ
हैं?
तुम
भी
रह
जाओगे
हैरान,
ज़रा
देख
तो
लो
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Javed Akhtar
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दुनिया
की
फ़िक्र
छोड़,
न
यूँँ
अब
उदास
बैठ
ये
वक़्त
रब
की
देन
है,
अम्मी
के
पास
बैठ
Salman Zafar
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वो
आँखें
आपके
ग़म
में
नहीं
हुई
हैं
नम
दिया
जलाते
हुए
हाथ
जल
गया
होगा
Shadab Javed
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तू
भी
कब
मेरे
मुताबिक
मुझे
दुख
दे
पाया
किस
ने
भरना
था
ये
पैमाना
अगर
ख़ाली
था
एक
दुख
ये
कि
तू
मिलने
नहीं
आया
मुझ
सेे
एक
दुख
ये
है
उस
दिन
मेरा
घर
ख़ाली
था
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Tehzeeb Hafi
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ख़ुदा
की
शा'इरी
होती
है
औरत
जिसे
पैरों
तले
रौंदा
गया
है
तुम्हें
दिल
के
चले
जाने
पे
क्या
ग़म
तुम्हारा
कौन
सा
अपना
गया
है
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Ali Zaryoun
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तेरे
जाने
से
ज़्यादा
हैं
न
कम
पहले
थे
हम
को
लाहक़
हैं
वही
अब
भी
जो
ग़म
पहले
थे
Afzal Khan
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गर
उदासी,
चिड़चिड़ापन,
जान
देना
प्यार
है
माफ़
करना,
काम
मुझको
और
भी
हैं
दोस्तो
Divy Kamaldhwaj
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तीरगी
ताक़
में
जड़ी
हुई
है
धूप
दहलीज़
पर
पड़ी
हुई
है
दिल
पे
नाकामियों
के
हैं
पैवंद
आस
की
सोई
भी
गड़ी
हुई
है
मेरे
जैसी
है
मेरी
परछाईं
धूप
में
पल
के
ये
बड़ी
हुई
है
घेर
रक्खा
है
ना-रसाई
ने
और
ख़्वाहिश
वहीं
खड़ी
हुई
है
मैं
ने
तस्वीर
फेंक
दी
है
मगर
कील
दीवार
में
गड़ी
हुई
है
हारता
भी
नहीं
ग़म-ए-दौराँ
ज़िद
पे
उम्मीद
भी
अड़ी
हुई
है
दिल
किसी
के
ख़याल
में
है
गुम
रात
को
ख़्वाब
की
पड़ी
हुई
है
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Ammar Iqbal
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जहल
को
आगही
बनाते
हुए
मिल
गया
रौशनी
बनाते
हुए
क्या
क़यामत
किसी
पे
गुज़रेगी
आख़िरी
आदमी
बनाते
हुए
क्या
हुआ
था
ज़रा
पता
तो
चले
वक़्त
क्या
था
घड़ी
बनाते
हुए
कैसे
कैसे
बना
दिए
चेहरे
अपनी
बे-चेहरगी
बनाते
हुए
दश्त
की
वुसअतें
बढ़ाती
थीं
मेरी
आवारगी
बनाते
हुए
उस
ने
नासूर
कर
लिया
होगा
ज़ख़्म
को
शाएरी
बनाते
हुए
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Ammar Iqbal
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नज़र
से
तुम
को
मिले
न
कोई
सुराग़
दिल
का
झुका
के
गर्दन
बुझा
लिया
है
चराग़
दिल
का
सुनूँ
न
कैसे
करूँँ
न
क्यूँँकर
मैं
अपने
दिल
की
मेरे
अलावा
है
कौन
इस
बद-दिमाग़
दिल
का
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Ammar Iqbal
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तख़य्युल
को
बरी
करने
लगा
हूँ
मैं
ज़ेहनी
ख़ुद-कुशी
करने
लगा
हूँ
मुझे
ज़िंदा
जलाया
जा
रहा
है
तो
क्या
मैं
रौशनी
करने
लगा
हूँ
मैं
आईनों
को
देखे
जा
रहा
था
अब
इन
से
बात
भी
करने
लगा
हूँ
तुम्हारी
बस
तुम्हारी
दुश्मनी
में
मैं
सब
से
दोस्ती
करने
लगा
हूँ
मुझे
गुमराह
करना
ग़ैर-मुमकिन
मैं
अपनी
पैरवी
करने
लगा
हूँ
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Ammar Iqbal
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यूँँही
बे-बाल-ओ-पर
खड़े
हुए
हैं
हम
क़फ़स
तोड़
कर
खड़े
हुए
हैं
दश्त
गुज़रा
है
मेरे
कमरे
से
और
दीवार-ओ-दर
खड़े
हुए
हैं
ख़ुद
ही
जाने
लगे
थे
और
ख़ुद
ही
रास्ता
रोक
कर
खड़े
हुए
हैं
और
कितनी
घुमाओगे
दुनिया
हम
तो
सर
थाम
कर
खड़े
हुए
हैं
बरगुज़ीदा
बुज़ुर्ग
नीम
के
पेड़
थक
गए
हैं
मगर
खड़े
हुए
हैं
मुद्दतों
से
हज़ार-हा
आलम
एक
उम्मीद
पर
खड़े
हुए
हैं
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Ammar Iqbal
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