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Ammar Iqbal
aakhirsh paak ho gaya kissa
aakhirsh paak ho gaya kissa | आखिरश पाक हो गया क़िस्सा
- Ammar Iqbal
आखिरश
पाक
हो
गया
क़िस्सा
ख़ाक
था
ख़ाक
हो
गया
क़िस्सा
खा
रहा
है
जने
हुए
अपने
कितना
सफ़्फ़ाक
हो
गया
क़िस्सा
अब
बचा
हूँ
मैं
आख़िरी
किरदार
अब
खतरनाक
हो
गया
क़िस्सा
- Ammar Iqbal
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जमाना
भूल
पायेगा
नहीं
अपनी
मुहब्बत
छपेंगे
क्लास
दसवीं
में
सभी
किस्से
हमारे
Shubham Seth
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मिले
फ़ुर्सत
तो
सुन
लेना
किसी
दिन
मिरा
क़िस्सा
निहायत
मुख़्तसर
है
Hafeez Banarasi
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मैं
क़िस्सा
मुख़्तसर
कर
के,
ज़रा
नीची
नज़र
कर
के
ये
कहता
हूँ
अभी
तुम
से,
मोहब्बत
हो
गई
तुम
से
Zubair Ali Tabish
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कुछ
न
रह
सका
जहाँ
विरानियाँ
तो
रह
गईं
तुम
चले
गए
तो
क्या
कहानियाँ
तो
रह
गईं
Khalil Ur Rehman Qamar
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हसीं
ख़्वाबों
को
अपने
साथ
में
ढोती
हुई
आंँखे
बहुत
प्यारी
लगी
हमको
तेरी
सोती
हुई
आंँखे
मोहब्बत
में
ये
दो
क़िस्से
सुना
है
रोज़
होते
हैं
कभी
हँसता
हुआ
चेहरा
कभी
रोती
हुई
आंँखे
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Naimish trivedi
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मैं
अगर
अपनी
जवानी
के
सुना
दूँ
क़िस्से
ये
जो
लौंडे
हैं
मेरे
पाँव
दबाने
लग
जाए
Mehshar Afridi
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हम
एक
रात
हुए
थे
क़रीब
और
क़रीब
फिर
उसके
बाद
का
क़िस्सा
गुनाह
जैसा
है
Aks samastipuri
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हमीं
तक
रह
गया
क़िस्सा
हमारा
किसी
ने
ख़त
नहीं
खोला
हमारा
मु'आफ़ी
और
इतनी
सी
ख़ता
पर
सज़ा
से
काम
चल
जाता
हमारा
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Shariq Kaifi
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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मुझ
को
कहानियाँ
न
सुना
शहर
को
बचा
बातों
से
मेरा
दिल
न
लुभा
शहर
को
बचा
Taimur Hasan
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तीरगी
ताक़
में
जड़ी
हुई
है
धूप
दहलीज़
पर
पड़ी
हुई
है
दिल
पे
नाकामियों
के
हैं
पैवंद
आस
की
सोई
भी
गड़ी
हुई
है
मेरे
जैसी
है
मेरी
परछाईं
धूप
में
पल
के
ये
बड़ी
हुई
है
घेर
रक्खा
है
ना-रसाई
ने
और
ख़्वाहिश
वहीं
खड़ी
हुई
है
मैं
ने
तस्वीर
फेंक
दी
है
मगर
कील
दीवार
में
गड़ी
हुई
है
हारता
भी
नहीं
ग़म-ए-दौराँ
ज़िद
पे
उम्मीद
भी
अड़ी
हुई
है
दिल
किसी
के
ख़याल
में
है
गुम
रात
को
ख़्वाब
की
पड़ी
हुई
है
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जाओ
मातम
गुज़ारो
जाने
दो
जिस
का
ग़म
है
उसे
मनाने
दो
बीच
से
एक
दास्ताँ
टूटी
और
फिर
बन
गए
फ़साने
दो
हम
फ़क़ीरों
को
कुछ
तो
दो
साहब
कुछ
नहीं
दे
सको
तो
ता'ने
दो
हाथ
जिस
को
लगा
नहीं
सकता
उस
को
आवाज़
तो
लगाने
दो
तुम
दिया
हो
तो
उन
पतंगों
को
कम
से
कम
रौशनी
में
आने
दो
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रात
से
जंग
कोई
खेल
नईं
तुम
चराग़ों
में
इतना
तेल
नईं
आ
गया
हूँ
तो
खींच
अपनी
तरफ़
मेरी
जानिब
मुझे
धकेल
नईं
जब
मैं
चाहूँगा
छोड़
जाऊँगा
इक
सराए
है
जिस्म
जेल
नईं
बेंच
देखी
है
ख़्वाब
में
ख़ाली
और
पटरी
पर
उस
पे
रेल
नईं
जिस
को
देखा
था
कल
दरख़्त
के
गिर्द
वो
हरा
अज़दहा
था
बेल
नईं
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Ammar Iqbal
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ख़ुद-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
अपनी
हस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
जब
से
देखा
है
इस
फ़क़ीरनी
को
फ़ाक़ा-मस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ख़ुद
तराशा
है
जब
से
बुत
अपना
बुत-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ये
फ़लक-ज़ाद
की
कहानी
है
इस
को
पस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
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जहल
को
आगही
बनाते
हुए
मिल
गया
रौशनी
बनाते
हुए
क्या
क़यामत
किसी
पे
गुज़रेगी
आख़िरी
आदमी
बनाते
हुए
क्या
हुआ
था
ज़रा
पता
तो
चले
वक़्त
क्या
था
घड़ी
बनाते
हुए
कैसे
कैसे
बना
दिए
चेहरे
अपनी
बे-चेहरगी
बनाते
हुए
दश्त
की
वुसअतें
बढ़ाती
थीं
मेरी
आवारगी
बनाते
हुए
उस
ने
नासूर
कर
लिया
होगा
ज़ख़्म
को
शाएरी
बनाते
हुए
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Ammar Iqbal
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