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Daqiiq Jabaali
dashanan ke ahem ko choor to hanumat hi kar dete
dashanan ke ahem ko choor to hanumat hi kar dete | दशानन के अहम को चूर तो हनुमत ही कर देते
- Daqiiq Jabaali
दशानन
के
अहम
को
चूर
तो
हनुमत
ही
कर
देते
मगर
शबरी
के
घर
पे
राम
का
जाना
ज़रूरी
था
- Daqiiq Jabaali
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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हसीन
यादों
के
चाँद
को
अलविदा'अ
कह
कर
मैं
अपने
घर
के
अँधेरे
कमरों
में
लौट
आया
Hasan Abbasi
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जितने
मर्ज़ी
महँगे
पकवानों
को
खालो
तुम
घर
की
रोटी
तो
फिर
घर
की
रोटी
होती
है
Sarvjeet Singh
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उन
के
होने
से
बख़्त
होते
हैं
बाप
घर
के
दरख़्त
होते
हैं
Unknown
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मैं
ये
भी
चाहती
हूँ
तिरा
घर
बसा
रहे
और
ये
भी
चाहती
हूँ
कि
तू
अपने
घर
न
जाए
Rehana Roohi
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इसी
उम्मीद
से
मैं
देखता
हूँ
रास्ता
उसका
वो
आएगा
ज़मी
बंजर
में
इक
दिन
घर
उगाने
को
Kushal "PARINDA"
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हमारे
घर
के
रिश्तों
में
अभी
बारीकियाँ
कम
हैं
भतीजा
मार
खाता
है
तो
चाचा
बोल
देते
हैं
Nirbhay Nishchhal
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इक
दिए
से
एक
कमरा
भी
बहुत
है
दिल
जलाने
से
ये
घर
रौशन
हुआ
है
Neeraj Neer
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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दिल
हर
किसी
की
बातों
में
आता
चला
गया
मैं
तन्हा
बैठ
आँसू
बहाता
चला
गया
जो
दिल
में
था
मेरे
वो
किसी
ने
नहीं
सुना
जो
भी
मिला
वो
अपनी
सुनाता
चला
गया
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Daqiiq Jabaali
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लौट
कर
दोबारा
मैं
आने
नहीं
वाला
अमित
फिर
वक़्त
के
जैसा
हूँ
मैं
तो
सोच
कर
खोना
मुझे
तुम
Daqiiq Jabaali
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यूँँ
हर
किसी
के
सामने
खुलता
नहीं
अमित
गर
खुल
गया
है
तो
उसे
सुनिए
सँभाल
कर
Daqiiq Jabaali
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कभी
घर
पर
कभी
बाहर
तुम्हारी
बात
करता
हूँ
ज़ियादा
तो
नहीं
दिनभर
तुम्हारी
बात
करता
हूँ
तुम्हारी
बातें
कर-कर
के
ही
तो
मैं
बन
गया
शायर
मैं
शायर
हूँ
सो
मैं
अक्सर
तुम्हारी
बात
करता
हूँ
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Daqiiq Jabaali
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उसको
भी
अफ़सोस
है
शायद
मियाँ
इस
बात
का
इश्क़
कर
लेती
मैं
उस
से
दोस्ती
को
छोड़कर
Daqiiq Jabaali
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