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Daqiiq Jabaali
kabhi ghar par kabhi baahar tumhaari baat karta hooñ
kabhi ghar par kabhi baahar tumhaari baat karta hooñ | कभी घर पर कभी बाहर तुम्हारी बात करता हूँ
- Daqiiq Jabaali
कभी
घर
पर
कभी
बाहर
तुम्हारी
बात
करता
हूँ
ज़ियादा
तो
नहीं
दिनभर
तुम्हारी
बात
करता
हूँ
तुम्हारी
बातें
कर-कर
के
ही
तो
मैं
बन
गया
शायर
मैं
शायर
हूँ
सो
मैं
अक्सर
तुम्हारी
बात
करता
हूँ
- Daqiiq Jabaali
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घर
में
झीने
रिश्ते
मैंने
लाखों
बार
उधड़ते
देखे
चुपके
चुपके
कर
देती
है
जाने
कब
तुरपाई
अम्मा
Aalok Shrivastav
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रोज़
ढक
लेती
थी
नीला
जिस्म
अपना
शुक्र
है
आ
गई
बाहर
घर
की
बातें
Parul Singh "Noor"
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हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
Nasir Kazmi
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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इसी
उम्मीद
से
मैं
देखता
हूँ
रास्ता
उसका
वो
आएगा
ज़मी
बंजर
में
इक
दिन
घर
उगाने
को
Kushal "PARINDA"
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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जितने
मर्ज़ी
महँगे
पकवानों
को
खालो
तुम
घर
की
रोटी
तो
फिर
घर
की
रोटी
होती
है
Sarvjeet Singh
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उस
को
रुख़्सत
तो
किया
था
मुझे
मालूम
न
था
सारा
घर
ले
गया
घर
छोड़
के
जाने
वाला
Nida Fazli
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मैं
ये
भी
चाहती
हूँ
तिरा
घर
बसा
रहे
और
ये
भी
चाहती
हूँ
कि
तू
अपने
घर
न
जाए
Rehana Roohi
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सब
कुछ
तो
है
क्या
ढूँडती
रहती
हैं
निगाहें
क्या
बात
है
मैं
वक़्त
पे
घर
क्यूँँ
नहीं
जाता
Nida Fazli
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सारे
दर्दों
से
किनारा
कर
रहे
हैं
शा'इरी
करके
गुज़ारा
कर
रहे
हैं
लोगों
ने
पूछा
पता
इक
बे-वफ़ा
का
हम
तेरी
जानिब
इशारा
कर
रहे
हैं
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Daqiiq Jabaali
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आख़िरश
क्यूँ
करें
ज़ाईदा
नया
तिफ़्ल
'अमित'
इस
सेे
बढ़िया
है
पिदर-मुर्दा
उठा
लाएँ
कोई
Daqiiq Jabaali
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जाने
इतना
प्यारा
रिश्ता
उसने
मुझ
सेे
तोड़ा
क्यूँँ
और
फिर
इक
ना-ख़लफ़
से
उसने
रिश्ता
जोड़ा
क्यूँँ
वो
बुलाती
थी
मुझे
मिस्टर
बिजी
के
नाम
से
पर
मुझे
इस
नाम
से
उसने
बुलाना
छोड़ा
क्यूँँ
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Daqiiq Jabaali
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तुम
भी
नहीं
हो
और
माँ
भी
तो
नहीं
है
ये
मन
कहाँ
जाकर
भला
हल्का
करें
हम
Daqiiq Jabaali
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बुरे
के
सामने
अच्छे
से
अच्छा
हार
जाता
है
कई
झूठे
इकट्टे
हों
तो
सच्चा
हार
जाता
है
Daqiiq Jabaali
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