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Amit Kumar
dil ik to duniya ke sabhi gham sahta hai
dil ik to duniya ke sabhi gham sahta hai | दिल इक तो दुनिया के सभी ग़म सहता है
- Amit Kumar
दिल
इक
तो
दुनिया
के
सभी
ग़म
सहता
है
चुप
चाप
फिर
गुम
होने
को
भी
कहता
है
मन
करता
है
मैं
मार
डालूँ
ख़ुद
को
अब
मेरे
ही
अंदर
मेरा
क़ातिल
रहता
है
कैसे
किसी
के
सामने
खुल
जाऊँ
मैं
इक
शख़्स
आँखों
से
भी
मेरे
बहता
है
दुनिया
के
सारे
ग़म
चले
जाते
हैं
पर
ये
उसका
ग़म
सीने
पे
जैसे
ढहता
है
- Amit Kumar
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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लगा
जब
कि
दुनिया
की
पहली
ज़रूरत
मोहब्बत
है
तब
उसने
माना
यक़ीं
हो
गया
जब
मोहब्बत
ज़रूरत
है
तब
उसने
माना
वगरना
तो
ये
लोग
उसे
ख़ुद-कुशी
के
लिए
कह
चुके
थे
उसे
आइने
ने
बताया
कि
वो
ख़ूब-सूरत
है
तब
उसने
माना
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Vikram Gaur Vairagi
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अपना
सब
कुछ
हार
के
लौट
आए
हो
न
मेरे
पास
मैं
तुम्हें
कहता
भी
रहता
था
कि
दुनिया
तेज़
है
Tehzeeb Hafi
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कल
जहाँ
दीवार
थी
है
आज
इक
दर
देखिए
क्या
समाई
थी
भला
दीवाने
के
सर
देखिए
Javed Akhtar
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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जिसकी
ख़ातिर
हम
भुला
बैठे
हैं
दुनिया
दोस्तों
से
ही
उन्हें
फ़ुर्सत
नहीं
है
Shashank Shekhar Pathak
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ग़म
और
ख़ुशी
में
फ़र्क़
न
महसूस
हो
जहाँ
मैं
दिल
को
उस
मक़ाम
पे
लाता
चला
गया
Sahir Ludhianvi
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हो
गए
राम
जो
तुम
ग़ैर
से
ए
जान-ए-जहाँ
जल
रही
है
दिल-ए-पुर-नूर
की
लंका
देखो
Kalb-E-Hussain Nadir
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मेरे
होंटों
पे
अपनी
प्यास
रख
दो
और
फिर
सोचो
कि
इस
के
बा'द
भी
दुनिया
में
कुछ
पाना
ज़रूरी
है
Waseem Barelvi
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टक
गोर-ए-ग़रीबाँ
की
कर
सैर
कि
दुनिया
में
उन
ज़ुल्म-रसीदों
पर
क्या
क्या
न
हुआ
होगा
Meer Taqi Meer
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उसने
कभी
भी
दिल
लगाया
ही
नहीं
लगता
है
फिर
भी
वो
पराया
ही
नहीं
उसने
कहा
था
साथ
पाओगे
मुझे
ख़ुद
को
खो
दोगे
ये
बताया
ही
नहीं
मैंने
उसे
अपना
बनाया
था
'अमित'
जिसने
मुझे
अपना
बनाया
ही
नहीं
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Amit Kumar
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एक
छह
साल
के
बच्चे
से
हँसना
सीखूँगा
मैं
अच्छे
से
ख़ुद
ही
रस्ते
पे
मैं
आ
गया
ज़िंदगी
तेरे
इक
धक्के
से
कोई
कानून
बनवाओ
अब
इश्क़
कम
है
नहीं
धंधे
से
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Amit Kumar
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इस
सोच
में
ही
मेरी
हर
रात
ढल
रही
है
बदले
हैं
लोग
या
फिर
दुनिया
बदल
रही
है
पानी
की
धार
पर
ये
मुझको
लगा
कि
जैसे
इक
सद
में
से
नदी
ये
बाहर
निकल
रही
है
मैं
कैसे
साथ
सबके
अपने
क़दम
मिलाऊँ
दुनिया
मिरी
समझ
से
कुछ
तेज़
चल
रही
है
वो
छाते
ही
अँधेरा
लगता
है
याद
आने
ये
देखो
शाम
भी
अब
जल्दी
से
ढल
रही
है
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Amit Kumar
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हो
गई
है
यार
हद
अब
बेबसी
की
कोई
ख़्वाहिश
है
नहीं
इस
ज़िंदगी
की
है
ज़रूरत
सबको
ही
सब
की
यहाँ
पर
पर
कोई
सुनता
कहाँ
है
अब
किसी
की
सूनी
सी
दुनिया
लगे
तो
मान
लेना
दो
क़दम
ही
दूर
है
मंज़िल
ख़ुशी
की
ज़ेहन
में
आ
के
वो
मेरे
झूमता
है
कितनी
यादें
अच्छी
है
अब
मयकशी
की
अपनी
करतूतों
से
ही
डर
जाए
जो
रख
दे
हक़ीक़त
सामने
अब
आदमी
की
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Amit Kumar
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मेरे
अंदर
जब
तलक
ये
दिल
नहीं
था
भूलना
मेरे
लिए
मुुश्किल
नहीं
था
उसको
महबूबास
ज़्यादा
चाहा
मैंने
दोस्ती
भर
के
भी
जो
क़ाबिल
नहीं
था
उम्र
भर
आते
रहे
हैं
ख़्वाब
उसके
ज़िंदगी
में
जो
मुझे
हासिल
नहीं
था
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Amit Kumar
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