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Amit Maulik
hain bahut khuddaar koi baat jab lag jaa.e to
hain bahut khuddaar koi baat jab lag jaa.e to | हैं बहुत ख़ुद्दार कोई बात जब लग जाए तो
- Amit Maulik
हैं
बहुत
ख़ुद्दार
कोई
बात
जब
लग
जाए
तो
चुप्पियों
का
होंठ
पर
ताला
लगा
लेते
हैं
वो
आजकल
मेरे
पिता
कहते
नहीं
हैं
कुछ
मुझे
आँख
नम
हो
जाए
तो
चश्मा
लगा
लेते
हैं
वो
- Amit Maulik
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है
राम
के
वजूद
पे
हिन्दोस्ताँ
को
नाज़
अहल-ए-नज़र
समझते
हैं
उस
को
इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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तूफ़ानों
से
आँख
मिलाओ
सैलाबों
पे
वार
करो
मल्लाहों
का
चक्कर
छोड़ो
तैर
के
दरिया
पार
करो
Rahat Indori
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फिर
किसी
के
सामने
चश्म-ए-तमन्ना
झुक
गई
शौक़
की
शोख़ी
में
रंग-ए-एहतराम
आ
ही
गया
Asrar Ul Haq Majaz
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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सौ
सौ
उमीदें
बँधती
है
इक
इक
निगाह
पर
मुझ
को
न
ऐसे
प्यार
से
देखा
करे
कोई
Allama Iqbal
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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कभी
पहले
नहीं
था
जिस
क़दर
मजबूर
हूँ
मैं
आज
नज़र
आऊँ
न
ख़ुद
क्या
तुम
सेे
इतना
दूर
हूँ
मैं
आज
तुम्हारे
ज़ख़्म
को
ख़ाली
नहीं
जाने
दिया
मैंने
तुम्हारी
याद
में
ही
चीख़
के
मशहूर
हूँ
मैं
आज
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SHIV SAFAR
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या
जला
देते
या
मिट्टी
में
दबा
देते
हैं
बाद
मरने
के
भुला
देते
हैं
दुनिया
वाले
Amit Maulik
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वो
फ़रिश्तों
से
कहीं
कम
नहीं
होते
साहिब
जिनको
लगता
है
ज़माने
को
हँसाना
अच्छा
Amit Maulik
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कैसे
आए
हैं
अब
हाल
सब
पूछने
जब
निशाने
हमारे
सही
लग
गए
Amit Maulik
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ज़बान
ऐसी
कोई
बे-ईमान
देता
है
यहाँ
किसी
के
लिए
कौन
जान
देता
है
Amit Maulik
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हुकूमत
करने
वाली
तिश्नगी
को
रोक
रक्खा
है
कहीं
कोई
तो
है
जिसने
घड़ी
को
रोक
रक्खा
है
न
जाने
कब
का
हो
जाता
ख़ुदा
इंसान
दुनिया
का
कोई
तो
है
कि
जिसने
आदमी
को
रोक
रक्खा
है
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Amit Maulik
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