ameek chhed ghazal gham ki intiha kab hai | अमीक़' छेड़ ग़ज़ल ग़म की इंतिहा कब है

  - Ameeq Hanafi
अमीक़'छेड़ग़ज़लग़मकीइंतिहाकबहै
येमालवेकीजुनूँ-ख़ेज़चौदहवींशबहै
मुझेशिकायत-ए-तल्ख़ी-ए-ज़हर-ए-ग़मकबहै
मिरेलबोंपेअभीकैफ़-ए-शक्कर-ए-लबहै
लकीरखिंचतीचलीजारहीहैता-बा-जिगर
फ़रोग़-ए-मयहैकिमश्क़-ए-जराहत-ए-शबहै
येमहवियतहैकिरो'ब-ए-जमालहैतारी
ख़िलाफ़-ए-रस्म-ए-जुनूँदिलबहुतमुअद्दबहै
कभीहरममेंहैकाफ़िरतोदैरमेंमोमिन
जानेक्यादिल-ए-दीवानातेरामज़हबहै
बहुतमुहालथावर्नाकिदिलफ़रेबमेंआए
किसीकेग़मसेग़म-ए-काएनातकीछबहै
चमनमेंफूलखिलातीफिरेबहारतोक्या
किसीकेबंद-ए-क़बाटूटनेलगेंतबहै
  - Ameeq Hanafi
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy