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Aman Mishra 'Anant'
ye duniya ki rivaayat chhod soni
ye duniya ki rivaayat chhod soni | ये दुनिया की रिवायत छोड़ सोनी
- Aman Mishra 'Anant'
ये
दुनिया
की
रिवायत
छोड़
सोनी
तू
रिश्ता
ज़िंदगी
से
जोड़
सोनी
ये
मेरा
दिल
है
अपने
पास
रखले
जो
गर
है
तोड़ना
तो
तोड़
सोनी
यहाँ
पे
अब
हमें
मरना
पड़ेगा
यहीं
है
आख़िरी
वो
मोड़
सोनी
तू
चाहें
आज
मुझको
छोड़
दे
पर
तू
हम
सेे
दोस्ती
मत
तोड़
सोनी
ज़रा
सी
है
तू
मुझ
सेे
जीत
लेगी
न
यूँँ
मेरी
कलाई
मोड़
सोनी
मैं
गिरके
पैरों
पर
ये
माँगता
हूँ
न
सुन
माँ
की
न
मुझको
छोड़
सोनी
- Aman Mishra 'Anant'
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मैं
सात
साल
से
अब
तक
हिसार-ए-इश्क़
में
हूँ
वो
शख़्स
आज
भी
मेरे
दिल-ओ-दिमाग़
में
है
Amaan Haider
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है
अब
भी
बिस्तर-ए-जाँ
पर
तिरे
बदन
की
शिकन
मैं
ख़ुद
ही
मिटने
लगा
हूँ
उसे
मिटाते
हुए
Azhar Iqbal
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सीने
लगाऊँ
ग़ैर
को
तो
पूछता
है
दिल
किसकी
जगह
थी
और
ये
सीने
पे
कौन
है
Ankit Maurya
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जिस
तरफ़
तू
है
उधर
होंगी
सभी
की
नज़रें
ईद
के
चाँद
का
दीदार
बहाना
ही
सही
Amjad Islam Amjad
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माँ-बाबा
का
सोच
के
हर
दम
रुक
जाता
हूँ
वरना
तो
इतने
ग़म
में
मैंने
पंखे
से
टंग
कर
मर
जाना
था
Shashwat Singh Darpan
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तमाम
फ़र्क़
मोहब्बत
में
एक
बात
के
हैं
वो
अपनी
ज़ात
का
नईं
है
हम
उस
की
ज़ात
के
हैं
Pallav Mishra
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कब
लौटा
है
बहता
पानी
बिछड़ा
साजन
रूठा
दोस्त
हम
ने
उस
को
अपना
जाना
जब
तक
हाथ
में
दामाँ
था
Ibn E Insha
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ये
ऐसा
क़र्ज़
है
जो
मैं
अदा
कर
ही
नहीं
सकता
मैं
जब
तक
घर
न
लौटूँ
मेरी
माँ
सज्दे
में
रहती
है
Munawwar Rana
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अदाकार
के
कुछ
भी
बस
का
नहीं
है
मोहब्बत
है
ये
कोई
ड्रामा
नहीं
है
जिसे
तेरी
आँखें
बताती
हैं
रस्ता
वो
राही
कहीं
भी
पहुँचता
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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सगी
बहनों
का
जो
रिश्ता
रिश्ता
है
उर्दू
और
हिन्दी
में
कहीं
दुनिया
की
दो
ज़िंदा
ज़बानों
में
नहीं
मिलता
Munawwar Rana
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जब
मंदिर
मस्जिद
तक
बात
चली
जाती
थी
तब
ये
मेरी
प्रेम
कहानी
घबराती
थी
आदत
से
मैं
उसको
देवी
कह
देता
था
आदत
में
वो
बुरखेे
वाली
शरमाती
थी
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Aman Mishra 'Anant'
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इस
से
पहले
जुदा
हो
जाऊँ
मैं
आ
तुझे
अपना
दिल
दिखाऊँ
मैं
शे'र
तो
ख़ैर
सारे
सुन
लेंगे
अपना
ये
दुख
किसे
सुनाऊँ
मैं
साल
जब
पूरा
ग़म
में
झोंक
दिया
जन्म-दिन
किस
लिए
मनाऊँ
मैं
आपके
दिल
में
भीड़
इतनी
है
अपना
बिस्तर
कहाँ
बिछाऊँ
मैं
चल
मेरे
साथ
देखने
तुझको
चल
तुझे
आज
तू
दिखाऊँ
मैं
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व्यर्थ
ही
सुर्ख़ियाँ
नहीं
मिलती
दान
में
तालियाँ
नहीं
मिलती
एक
की
नौकरी
नहीं
लगती
पाँच
को
रोटियाँ
नहीं
मिलती
वरना
मैं
भी
ख़रीद
लेता
माँ
शहर
में
लोरियाँ
नहीं
मिलती
तुम
इसे
मेला
कैसे
कहते
हो
जब
यहाँ
चूड़ियाँ
नहीं
मिलती
आज
वो
फूल
भी
नहीं
खिलते
आज
वो
तितलियाँ
नहीं
मिलती
केक
मिलता
है
जन्मदिन
पर
अब
क्यूँ
कहीं
बूंदियाँ
नहीं
मिलती
पिछले
सब
कर्म
देखे
जाते
हैं
ऐसे
ही
बेटियाँ
नहीं
मिलती
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प्रेम
के
आसक्त
करते
वेदना
का
जाप
है
हम
अभागों
पर
लगा
पीड़ा
का
कोई
श्राप
है
इसका
कोई
दुख
नहीं
है
रूष्ट
सारे
लोग
हैं
किंतू
क्रोधित
सब
सेे
ज़्यादा
हम
सेे
अपना
आप
है
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Aman Mishra 'Anant'
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कश्मकश
ख़त्म
कर
रहा
हूँ
मैं
ज़िंदगी
हार
मानता
हूँ
मैं
था
किसी
और
की
दु'आओं
में
और
जाने
किसे
मिला
हूँ
मैं
वस्ल
में
था
तिरे
तबह
पर
अब
तेरे
दुख
में
सँभल
चुका
हूँ
मैं
सोचता
हूँ
ये
देखकर
तुझको
देखकर
के
क्या
सोचता
हूँ
मैं
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Aman Mishra 'Anant'
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