har ik shajar pe parinde simat ke baithe hain | हर इक शजर पे परिंदे सिमट के बैठे हैं

  - Alok Mishra
हरइकशजरपेपरिंदेसिमटकेबैठेहैं
हवा-ए-सर्दकेझोंकेबहुतनुकीलेहैं
कहाँसँभलताहैजल्दीकिसीकीमौतसेदिल
हाँठीक-ठाकहैंपहलेसेथोड़ेअच्छेहैं
धुआँधुआँसीहैफ़िहरिस्त-ए-रफ़्तगाँलेकिन
दोएकचेहरेहैंवैसेहीजगमगातेहैं
तुझेख़बरभीहैदोस्ततेरेमरहमसे
कुछएकज़ख़्मजोअंदरनएसेबनतेहैं
क़दमक़दमपेनएमोड़मुड़नेवालेलोग
जानेक्यूँमुझेअबठीकजानपड़तेहैं
जुदाहुएतोबहुतदिनगुज़रगएलेकिन
हवा-ए-ताज़ाकेझोंकोंसेअबभीडरतेहैं
कभीतोख़ूबसिसकतेहैंबे-तरहऔरफिर
ख़याल-ए-मर्गसेयक-दमचहकनेलगतेहैं
  - Alok Mishra
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