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Ali Mohammed Shaikh
aise shagufta rang guzishta kabhi na tha
aise shagufta rang guzishta kabhi na tha | ऐसे शगुफ्ता रंग गुज़िश्ता कभी न था
- Ali Mohammed Shaikh
ऐसे
शगुफ्ता
रंग
गुज़िश्ता
कभी
न
था
मैं
फूल
था
मगर
तेरे
दर
का
कभी
न
था
इतना
तेरे
दयार
से
मुझको
अता
हुआ
इतना
नसीब
ने
मेरे
सोचा
कभी
न
था
- Ali Mohammed Shaikh
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इक
गुल
के
मुरझाने
पर
क्या
गुलशन
में
कोहराम
मचा
इक
चेहरा
कुम्हला
जाने
से
कितने
दिल
नाशाद
हुए
Faiz Ahmad Faiz
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मदमस्त
महकते
फूलों
को
इन
कलियों
को
चूमा
जाए
इक
ख़्वाहिश
मेरी
यह
भी
है
तेरी
गलियों
में
घूमा
जाए
Akash Rajpoot
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किसी
कली
किसी
गुल
में
किसी
चमन
में
नहीं
वो
रंग
है
ही
नहीं
जो
तिरे
बदन
में
नहीं
Farhat Ehsaas
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तितलियाँ
यूँँ
ही
नहीं
बैठ
रही
हैं
तुम
पर
बारहा
तुमको
भी
फूलों
में
गिना
जाता
है
Nasir khan 'Nasir'
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अरे
सय्याद
हमीं
गुल
हैं
हमीं
बुलबुल
हैं
तू
ने
कुछ
आह
सुना
भी
नहीं
देखा
भी
नहीं
Firaq Gorakhpuri
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हज़ार
बर्क़
गिरे
लाख
आँधियाँ
उट्ठें
वो
फूल
खिल
के
रहेंगे
जो
खिलने
वाले
हैं
Sahir Ludhianvi
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वो
मिरी
बाहों
में
बे-फ़िक्र
मुलव्विस
हुई
है
कब्र
पे
हार
कोई
फूलों
का
रक्खा
हुआ
है
Raj
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तोहफ़ा,
फूल,
शिकायत,
कुछ
तो
लेकर
जा
इश्क़
से
मिलने
ख़ाली
हाथ
नहीं
जाते
Tanoj Dadhich
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कभी
फूल
देखती
है
कभी
देखती
है
कलियाँ
मुझे
कर
रही
है
पागल
ये
नज़र
फिसल
फिसल
के
Ajeetendra Aazi Tamaam
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बिखर
के
फूल
फ़ज़ाओं
में
बास
छोड़
गया
तमाम
रंग
यहीं
आस-पास
छोड़
गया
Aanis Moin
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जब
से
तेरी
निगाह
में
सजने
लगे
है
हम
ख़ुद
को
बड़ा
हसीन
समझने
लगे
है
हम
Ali Mohammed Shaikh
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उम्मीद
तलब
हसरत
अरमान
निकल
जाएँ
अल्लाह
करे
दिल
से
ये
शैतान
निकल
जाएँ
दुनिया
की
तिजारत
में
है
आज
मुनाफे
बहुत
ऐसा
न
हो
आख़िर
में
नुकसान
निकल
जाएँ
इस
दौरे
जहालत
में
जंगल
में
बसाके
घर
कोशिश
में
लगे
है
सब
इंसान
निकल
जाए
तू
खोल
दे
फिर
हम
पर
दीवार-ओ-दर-ए-रहमत
घर
बैठे
हुए
या
रब
न
रमज़ान
निकल
जाएँ
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Ali Mohammed Shaikh
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मेरी
नज़रे
उठी
उठी,
तेरी
नज़रें
झूकी
झुकी
तोल
रहे
हैं
प्यार
को
जैसे
दो
पैमानों
में
Ali Mohammed Shaikh
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जिए
हर
घड़ी
जो
किसी
के
लिए
हमारी
ग़ज़ल
है
उसी
के
लिए
बटे
होंगे
जब
तक
हमारे
मकाँ
झगड़ते
रहेंगे
गली
के
लिए
दिवाना
समझती
है
दुनिया
उसे
लड़े
जो
अकेले
सभी
के
लिए
ख़ता
कुछ
हमारी
समझ
की
भी
है
धुएँ
को
चुना
रोशनी
के
लिए
सुना
जाएँ
कोई
लतीफा
हमें
है
तरसे
हुए
लब
हँसी
के
लिए
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Ali Mohammed Shaikh
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जितनी
जल्दी
आँखें
अपनी
खोलेगा
सूरज
को
मुट्ठी
पे
अपनी
तोलेगा
Ali Mohammed Shaikh
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