chale the bhar ke ret jab safar ki jism-o-jaan men ham | चले थे भर के रेत जब सफ़र की जिस्म-ओ-जाँ में हम

  - Aleem Afsar
चलेथेभरकेरेतजबसफ़रकीजिस्म-ओ-जाँमेंहम
तोसाहिलोंकाअक्सदेखतेथेबादबाँमेंहम
तुयूरथेजोघोंसलोंमेंपैकरोंकेउड़गए
अकेलेरहगएहैंअपनेख़्वाबकेमकाँमेंहम
हमारीजुस्तुजूभीअबतोहोगईहैगर्दगर्द
किनक़्श-ए-पाकोढूँडतेहैंरहकेहरनिशाँमेंहम
इशारियतथीबे-ज़बाँथालफ़्ज़लफ़्ज़दास्ताँ
सुनातेकिसतरहकिगुमथेख़ुदहीदास्ताँमेंहम
बरसरहीहैआसमाँसेमिस्ल-ए-संगतीरगी
खड़ेहैंकबसेतेरीआरज़ूकेसाएबाँमेंहम
ज़मींकादर्दबे-बदनभीहोकेअपनेदिलमेंथा
तभीतोखिंचकेगएथेवर्नाआसमाँमेंहम
नफ़सनफ़सहैज़िंदगीकाकारोबारमुन्तशर
दीवालियाहुएकिजबसेआएइसजहाँमेंहम
  - Aleem Afsar
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