habs-e-daroon pe jism-e-giraan-baar sang tha | हब्स-ए-दरूँ पे जिस्म-ए-गिराँ-बार संग था

  - Akram Naqqash
हब्स-ए-दरूँपेजिस्म-ए-गिराँ-बारसंगथा
वहशतपेमेरीअरसा-ए-आफ़ाक़तंगथा
कुछदूरतकसहाब-ए-रिफ़ाक़तरहारफ़ीक़
फिरएहतमाम-ए-बारिश-ए-तीर-ओ-तफ़ंगथा
सहमीहुईफ़ज़ा-ए-ग़ज़ालाँकेरू-ब-रू
जंगलथाक़हक़हेथेख़ुदाथामैंदंगथा
अबशहर-ए-जुस्तुजूमेंतिरेबादकुछनहीं
आबादी-ए-बदनमेंजोदिलथामलंगथा
जीयेकरेहैआजकितन्हाजिएँमरें
कबमेरेइज़्तिराबकायेरंग-ढंगथा
हरशाममुज़्महिलसीसवेराबुझाबुझा
तुझसेपरेजोदेखायहीएकरंगथा
  - Akram Naqqash
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