safar hi shart-e-safar hai to khatm kya hogaa | सफ़र ही शर्त-ए-सफ़र है तो ख़त्म क्या होगा

  - Akhtar Saeed Khan
सफ़रहीशर्त-ए-सफ़रहैतोख़त्मक्याहोगा
तुम्हारेघरसेउधरभीयेरास्ताहोगा
ज़मानासख़्तगिराँख़्वाबहैमगरदिल
पुकारतोसहीकोईतोजागताहोगा
येबे-सबबनहींआएहैंआँखमेंआँसू
ख़ुशीकालम्हाकोईयादगयाहोगा
मिराफ़सानाहरइकदिलकामाजरातोथा
सुनाभीहोगाकिसीनेतोक्यासुनाहोगा
फिरआजशामसेपैकारजानतनमेंहै
फिरआजदिलनेकिसीकोभुलादियाहोगा
विदाकरमुझेज़िंदगीगलेमिलके
फिरऐसादोस्ततुझसेकभीजुदाहोगा
मैंख़ुदसेदूरहुआजारहाहूँफिर'अख़्तर'
वोफिरक़रीबसेहोकरगुज़रगयाहोगा
  - Akhtar Saeed Khan
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