kaise samjhaaoon naseem-e-subh tujh ko kya hooñ main | कैसे समझाऊँ नसीम-ए-सुब्ह तुझ को क्या हूँ मैं

  - Akhtar Saeed Khan
कैसेसमझाऊँनसीम-ए-सुब्हतुझकोक्याहूँमैं
फूलकेसाएमेंमुरझायाहुआपत्ताहूँमैं
ख़ाककाज़र्राभीकोईतेरेदामनमेंथा
क़द्रकरज़िंदगीटूटाहुआताराहूँमैं
हरधड़कतेदिलसेअन-जानासारिश्ताहैमिरा
आगदामनमेंकिसीकेभीलगेजलताहूँमैं
अपनीतारीकीसमेटेपूछतीहैमुझसेरात
कौनसीहैसुब्हजिसकोढूँढनेनिकलाहूँमैं
मुझकोसमझाएतोकोईराज़दार-ए-काएनात
मुझमेंहैआबादयेदुनियाकिख़ुदअपनाहूँमैं
ज़िंदगीटूटेहुएख़्वाबोंमेंगुज़रीहैतोक्या!
आजभीइकख़्वाबआँखोंमेंलिएबैठाहूँमैं
सम्त-ए-मंज़िलहीबदलजाएतोमेराक्याक़ुसूर
रास्तोंसेपूछकरदेखोकहींठहराहूँमैं
देरतकहसरतसेदेखेगीउसेशाम-ए-सफ़र
जिसज़मींपरनक़्शअपनेछोड़करगुज़राहूँमैं
चुपकेचुपकेरातभरकहताहै'अख़्तर'मुझसेदिल
बस्तियाँआबादहैंमुझसेमगरसहराहूँमैं
  - Akhtar Saeed Khan
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