vo husn-e-sabz jo utara nahin hai daali par | वो हुस्न-ए-सब्ज़ जो उतरा नहीं है डाली पर

  - Akhtar Razaa Saleemi
वोहुस्न-ए-सब्ज़जोउतरानहींहैडालीपर
फ़रेफ़्ताहैकिसीफूलचुननेवालीपर
मैंहलचलातेहुएजिसकोसोचाकरताथा
उसीकीगंदुमीरंगतहैबालीबालीपर
येलोगसैरकोनिकलेहैंसोबहुतख़ुशहैं
मैंदिल-ए-गिरफ़्ताहूँसब्ज़ेकीपाएमालीपर
इकऔररंगमिलाकेसातरंगोंमें
शुआ-ए-महरपड़ीजबसेतेरीबालीपर
मैंखुलकेसाँसभीलेतानहींचमनमें'रज़ा'
मुबादाबारगुज़रताहोसब्ज़डालीपर
  - Akhtar Razaa Saleemi
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