tumhaare hone ka shaayad suraagh paane lage | तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे

  - Akhtar Razaa Saleemi
तुम्हारेहोनेकाशायदसुराग़पानेलगे
कनार-ए-चश्मकईख़्वाबसरउठानेलगे
पलकझपकनेमेंगुज़रेकिसीफ़लकसेहम
किसीगलीसेगुज़रतेहुएज़मानेलगे
मिराख़यालथायेसिलसिलादियोंतकहै
मगरयेलोगमिरेख़्वाबभीबुझानेलगे
न-जानेराततिरेमय-कशोंकोक्यासूझी
सुबूउठातेउठातेफ़लकउठानेलगे
वोघरकरेकिसीदिलमेंतोऐनमुमकिनहै
हमारीदर-बदरीभीकिसीठिकानेलगे
मैंगुनगुनातेहुएजारहाथानामतिरा
शजरहजरभीमिरेसाथगुनगुनानेलगे
हुदूद-ए-दश्तमेंआबादियाँजोहोनेलगीं
हमअपनेशहरमेंतन्हाइयाँबसानेलगे
धुआँधनकहुआअँगारफूलबनतेगए
तुम्हारेहाथभीक्यामोजज़ेदिखानेलगे
'रज़ा'वोरनपड़ाकलशबब-रज़्म-ए-गाह-ए-जुनूँ
कुलाहेंछोड़केसबलोगसरबचानेलगे
  - Akhtar Razaa Saleemi
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