ham dard-e-nihaan ko mehfil men roosva-e-hikaayat kar na sake | हम दर्द-ए-निहाँ को महफ़िल में रूस्वा-ए-हिकायत कर न सके

  - Akhtar Husain Shaafi
हमदर्द-ए-निहाँकोमहफ़िलमेंरूस्वा-ए-हिकायतकरसके
कहनेकोबहुतकुछथालेकिनकुछउनसेख़िताबतकरसके
हुस्नज़रादमभरकेलिएकुछशोख़तुझेभीहोनाथा
दोदिलथेफ़िदाआपसमेंमगरइज़हार-ए-मोहब्बतकरसके
गुज़रेहुएलम्होंकीयादेंअबशौक़-ए-वफ़ासेकहतीहैं
जोशयथीक़रीब-ए-क़ल्ब-ओ-जिगरउसशयसेरिफ़ाक़तकरसके
हरशौक़बढ़ाकरसपनेमेंज़हमततोउठाईराहोंकी
पहुँचेतोदर-ए-का'बापेमगरका'बेकीज़ियारतकरसके
सीनेमेंख़लिशहैफ़ुर्क़तकीबेताबतमन्नाहैमेरी
जोहमसेमोहब्बतकरतेथेहमउनपेइनायतकरसके
चंचलभीवोथेचालाकभीथेपरशर्म-ओ-हयाभीऐसीथी
हममनकेपुरानेपापीभीकुछउनसेशरारतकरसके
वाइज़नेकहाथाज़ब्तकरोजज़्बात-ए-मोहब्बतकोलेकिन
हमउसकीहिदायतपरचलकरइसदिलकीहिफ़ाज़तकरसके
दुनियाकेग़मोंकाख़ौफ़नहींबेबाकमुसाफ़िरको'शाफ़ी'
दमभरकेलिएपलकोंकेतलेअफ़्सोसइक़ामतकरसके
  - Akhtar Husain Shaafi
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