soz-e-daroon se jal-bujho lekin dhuaan na ho | सोज़-ए-दरूँ से जल-बुझो लेकिन धुआँ न हो

  - Akhtar Bastavi
सोज़-ए-दरूँसेजल-बुझोलेकिनधुआँहो
हैदर्द-ए-दिलकीशर्तकिलबपरफ़ुग़ाँहो
फिरहोरहाहैशोर-ए-सला-ए-नबर्द-ए-इश्क़
हाँदहान-ए-ज़ख़्मजवाबअल-अमाँहो
बाज़ार-ए-जाँ-फ़रोशमेंसौदाहोयेक्या
गाहकमिलेतोजिंसतोयेभीगराँहो
इसदर्द-ए-ला-जवाबकीक्यूँँकरकरूँँदवा
वोहाल-ए-दिल-नशींभीतोमुझसेबयाँहो
क्याफ़ाएदागरउसनेछुपायाभीदर्द-ए-दिल
येकामजबबनेकिमिज़ाख़ूँ-चकाँहो
क्याकीजेचुनकेमाएदा-ए-दिलकोलख़्तलख़्त
तेराहीतीरसीनेमेंजबमेहमाँहो
ख़ौफ़-ए-रक़ीबकातोयेआलमऔरउसपेइश्क़
सबचाहतेहैंचाहकाउनपरगुमाँहो
हैवस्ल-ए-यारकीभीतमन्नाकाहौसला
डरयेभीहैकितब्अ'-ए-अदूपरगिराँहो
पहलूसेदिलकोलेकेवोकहतेहैंनाज़से
क्याआएँघरमेंआपहीजबमेज़बाँहो
सुनतेहीजिसकेख़ल्क़सेकोहराममचगया
'जौहर'वोतेरीहीतोकहींदास्ताँहो
  - Akhtar Bastavi
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