shauq-e-izhaar hai karna bhi nahin chahte hain | शौक़-ए-इज़हार है करना भी नहीं चाहते हैं

  - Akhtar Azad
शौक़-ए-इज़हारहैकरनाभीनहींचाहतेहैं
अपनेवादेसेमुकरनाभीनहींचाहतेहैं
कोईतोहैमुझेजीनेकीदु'आदेताहै
हमतिरेइश्क़मेंमरनाभीनहींचाहतेहैं
तुझसेमिलनेकीतमन्नाभीबहुतहैदिलमें
तिरेकूचेसेगुज़रनाभीनहींचाहतेहैं
दिलयेकहताहैसिमटजाएँतिरीबाँहोंमें
बू-ए-गुलबनकेबिखरनाभीनहींचाहतेहैं
झाँकतेहैंमिरीआँखोंमेंबचाकरनज़रें
गोब-ज़ाहिरवोसँवरनाभीनहींचाहतेहैं
देकेआवाज़कोईरोकरहाकबसे
औरहमहैंकिठहरनाभीनहींचाहतेहैं
लोगसाहिलपेखड़ेढूँढ़रहेहैंमोती
बहतेपानीमेंउतरनाभीनहींचाहतेहैं
  - Akhtar Azad
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