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AKASH
bahut lagta bura hai qahqaha mujhkona jaane ho gaya hai dost kya mujhko
bahut lagta bura hai qahqaha mujhkona jaane ho gaya hai dost kya mujhko | बहुत लगता बुरा है क़हक़हा मुझको
- AKASH
बहुत
लगता
बुरा
है
क़हक़हा
मुझको
न
जाने
हो
गया
है
दोस्त
क्या
मुझको
उसे
कहना
कि
उसके
बाद
जाने
के
सिवा
उसके
नहीं
कुछ
भी
दिखा
मुझको
मैं
तो
हर
मसअला
उसका
समझता
हूँ
समझता
है
मगर
वो
मसअला
मुझको
निकलते
हैं
तेरे
ही
फूल
यादों
के
रखे
है
इक
शजर
यूँँ
भी
हरा
मुझको
समुंदर
पार
करना
है
जुदाई
का
मेरी
ही
ले
न
डूबे
ये
अना
मुझको
- AKASH
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थी
वस्ल
में
भी
फ़िक्र-ए-जुदाई
तमाम
शब
वो
आए
तो
भी
नींद
न
आई
तमाम
शब
Momin Khan Momin
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शब-ए-विसाल
बहुत
कम
है
आसमाँ
से
कहो
कि
जोड़
दे
कोई
टुकड़ा
शब-ए-जुदाई
का
Ameer Minai
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उस
सेे
तो
मैं
बिछड़
गया
अब
देख
ऐ
'पवन'
कब
दुनिया
आए
रास
यही
सोचता
रहा
Pawan Kumar
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हिज्र
में
ख़ुद
को
तसल्ली
दी
कहा
कुछ
भी
नहीं
दिल
मगर
हँसने
लगा
आया
बड़ा
कुछ
भी
नहीं
Afkar Alvi
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बिछड़
के
तुझ
सेे
न
देखा
गया
किसी
का
मिलाप
उड़ा
दिए
हैं
परिंदे
शजर
पे
बैठे
हुए
Adeem Hashmi
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नाम
पे
हम
क़ुर्बान
थे
उस
के
लेकिन
फिर
ये
तौर
हुआ
उस
को
देख
के
रुक
जाना
भी
सब
से
बड़ी
क़ुर्बानी
थी
मुझ
से
बिछड़
कर
भी
वो
लड़की
कितनी
ख़ुश
ख़ुश
रहती
है
उस
लड़की
ने
मुझ
से
बिछड़
कर
मर
जाने
की
ठानी
थी
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Jaun Elia
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बिछड़
कर
मुझ
सेे
तुझको
क्या
मिला
है
कि
जो
कुछ
था
वो
भी
खोना
पड़ा
है
गया
था
जिस
जगह
पर
छोड़
कर
तू
उसी
रस्ते
पे
दिल
अब
भी
खड़ा
है
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ATUL SINGH
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अमीर
इमाम
के
अश'आर
अपनी
पलकों
पर
तमाम
हिज्र
के
मारे
उठाए
फिरते
हैं
Ameer Imam
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हिज्र
की
रातें
इतनी
भारी
होती
हैं
जैसे
छाती
पर
ऐरावत
बैठा
हो
Tanoj Dadhich
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बचा
के
आँख
बिछड़
जाएँ
उस
से
चुपके
से
अभी
तो
अपनी
तरफ़
ध्यान
भी
ज़ियादा
नहीं
Vipul Kumar
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नाम
तेरा
गुन-गुनाता
जा
रहा
हूँ
तीरगी
को
मैं
मिटाता
जा
रहा
हूँ
लुत्फ़
आता
है
उदासी
में
मुझे
अब
हर
ख़ुशी
में
ग़म
मिलाता
जा
रहा
हूँ
छोड़ने
आया
नहीं
है
कोइ
मुझको
हाथ
मैं
किसको
हिलाता
जा
रहा
हूँ
बज
रहे
हैं
रात
के
दो
मैं
मुसलसल
गीत
नुसरत
के
बजाता
जा
रहा
हूँ
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AKASH
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तुम्हारे
ग़म
कभी
ओझल
न
होंगे
हमेशा
हम
मगर
बेकल
न
होंगे
ख़ुदा
तुमको
कहेगा
फिर
भला
कौन
ज़माने
में
अगर
पागल
न
होंगे
लगी
है
ऐसी
इक
आँखों
में
तस्वीर
कलर
जिसके
कभी
भी
डल
न
होंगे
हँसी
पे
तो
यक़ीं
कर
सकते
हैं
हम
मगर
आँसू
रिलायेबल
न
होंगे
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AKASH
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और
तो
क्या
है
अच्छा
मुझ
में
यादों
का
है
दरिया
मुझ
में
बाद
तुम्हारे
रंज-ओ-ग़म
ने
खोला
है
दरवाज़ा
मुझ
में
मेरा
चेहरा
ज़ुल्फ़ें
तेरी
ठहरा
है
इक
लम्हा
मुझ
में
सूरज
से
कहती
है
धरती
बहुत
भरा
है
लावा
मुझ
में
इक
भोली
सूरत
वाली
ने
किया
है
जादू
टोना
मुझ
में
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AKASH
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हम
पर
नहीं
है
गर
यक़ीं
कोई
नहीं
है
आपके
जैसा
कहीं
कोई
नहीं
है
दुश्मनी
में
यार
जायज़
सब
मगर
कहता
कोई
है
आफ़रीं
कोई
नहीं
उसके
लबों
की
है
तलब
रखते
कई
अब
चूमता
उसकी
जबीं
कोई
नहीं
यानी
उसे
भी
अब
सताता
हिज्र
है
यानी
ख़ुशी
कोई
नहीं
कोई
नहीं
आँखों
से
निकले
हम
तुम्हारी
तो
खुला
है
भूलता
क्यूँँ
सर
ज़मीं
कोई
नहीं
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समुंदर
जैसी
आँखें
उसकी
देखीं
जब
हमें
क्यूँ
दी
है
बीनाई
समझ
आई
AKASH
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