jab k | जब कभी मद्द-ए-मुक़ाबिल वो रुख़-ए-ज़ेबा हुआ

  - Ajiz Matvi
जबकभीमद्द-ए-मुक़ाबिलवोरुख़-ए-ज़ेबाहुआ
आईनाभीरहगयाहैरतसेमुँहतकताहुआ
फ़स्ल-ए-गुलमेंहैशिकस्त-ओ-रेख़्तकाआईना-दार
एकइकतिनकानशेमनकामिरेबिखराहुआ
महव-ए-हैरतहूँख़राश-ए-दस्त-ए-ग़मकोदेखकर
ज़ख़्मचेहरेपरहैंयाहैआईनाटूटाहुआ
अब्र-ए-ग़मबरसेतोअश्कोंकीरवानीदेखना
साहिल-ए-मिज़्गाँपेहैतूफ़ाँअभीठहराहुआ
इख़्तिलाफ़-ए-ज़ेहन-ए-फ़ितरतज़िंदगानीकासराब
इश्तिराक-ए-बाहमीहीमौजिब-ए-दरियाहुआ
जबमैंउनसेकहचुकाअपनीहदीस-ए-रंज-ओ-ग़म
उनकीशोख़ीदेखिएकहनेलगेपरक्याहुआ
मैंसमझपाया'आजिज़'येतिलिस्म-ए-राहबर
हरक़दमपरमंज़िल-ए-मक़्सूदकाधोकाहुआ
  - Ajiz Matvi
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy