main iztiraab men hooñ shaam se sehar ke li.e | मैं इज़्तिराब में हूँ शाम से सहर के लिए

  - Ajiz Matvi
मैंइज़्तिराबमेंहूँशामसेसहरकेलिए
कोईचराग़अताकरदेरात-भरकेलिए
ख़ुदाबचाएतुम्हेंऐसी-वैसीनज़रोंसे
गलेमेंडाललोता'वीज़तुमनज़रकेलिए
क़फ़स-नसीबहैंना-आश्ना-ए-आज़ादी
येक़ैदएकचुनौतीहैबाल-ओ-परकेलिए
निगाह-ए-बर्क़मेंवोख़ारसेखटकनेलगे
जोतिनकेजम्अ''किएहमनेअपनेघरकेलिए
मसीह-ए-वक़्ततोऐसीनफ़ससहीलेकिन
इलाजहैकोईज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जिगरकेलिए
तुम्हारेहुस्न-ओ-अदाकेहमींशिकारनहीं
जानेकितनोंकेदिलतुमनेबन-सँवरकेलिए
तमाम-उम्रअँधेरेमेंकटगईयारब
कोईचराग़अताकरहमारेघरकेलिए
किसीकेसामनेसरख़मकरूँँमैंक्यूँँ'आजिज़'
बनीहैमेरीजबींउनकेसंग-ए-दरकेलिए
  - Ajiz Matvi
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