zehan par jab dard KHaamushi ki chadar taantaa hai | ज़ेहन पर जब दर्द ख़ामोशी की चादर तानता है

  - Ainuddin Azim
ज़ेहनपरजबदर्दख़ामोशीकीचादरतानताहै
क़तराक़तराआँखसेलफ़्ज़-ओ-मआनीछानताहै
हरकस-ओ-ना-कसकोरासआतीनहींआवारागर्दी
रास्तेउसपरहीखुलतेहैंजोचलनाजानताहै
नक़्श-ए-पारीनाहटाकरमैंनएपैकरतराशूँ
कूज़ा-गरकंकरहटाकरजैसेमिट्टीसानताहै
वोहैदीवानाउसेगुमनामीतश्हीरसेक्या
ख़ामुशीसेकरगुज़रताहैजोदिलमेंढानताहै
कोर-चश्मीनेबिखेराहुस्नकाशीराज़ावर्ना
इश्तिहारीजिस्मभीपोशीदगीकोमानताहै
येसिलाभीकमनहीं'आज़िम'तिरीमश्क़-ए-सुख़नका
कोईग़ज़लोंकेहवालेसेतुझेपहचानताहै
  - Ainuddin Azim
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