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Faiz Ahmad
kisi ke ranj se usko nikaal kar pahle
kisi ke ranj se usko nikaal kar pahle | किसी के रंज से उसको निकाल कर पहले
- Faiz Ahmad
किसी
के
रंज
से
उसको
निकाल
कर
पहले
उसी
के
रंज
में
अब
ख़ुद
ही
फस
गया
हूँ
मैं
बड़ा
कमीन
हूँ
दलदल
में
पैर
ख़ुद
रखकर
ये
कह
रहा
हूँ
कि
धोखे
से
धस
गया
हूँ
मैं
- Faiz Ahmad
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ये
ग़म
नहीं
है
कि
हम
दोनों
एक
हो
न
सके
ये
रंज
है
कि
कोई
दरमियान
में
भी
न
था
Jamal Ehsani
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हम
अपनी
जान
के
दुश्मन
को
अपनी
जान
कहते
हैं
मोहब्बत
की
इसी
मिट्टी
को
हिंदुस्तान
कहते
हैं
Rahat Indori
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याद
आई
जब
मुझे
'फ़रहत'
से
छोटी
थी
बहन
मेरे
दुश्मन
की
बहन
ने
मुझ
को
राखी
बाँध
दी
Ehsan Saqib
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ज़रा
मौसम
तो
बदला
है
मगर
पेड़ों
की
शाख़ों
पर
नए
पत्तों
के
आने
में
अभी
कुछ
दिन
लगेंगे
बहुत
से
ज़र्द
चेहरों
पर
ग़ुबार-ए-ग़म
है
कम
बे-शक
पर
उन
को
मुस्कुराने
में
अभी
कुछ
दिन
लगेंगे
Javed Akhtar
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इस
आ
समाँ
को
मुझ
सेे
है
क्या
दुश्मनी
"अली"?
भेजूं
अगर
दु'आ
भी
तो
सर
पर
लगे
मुझे
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Ali Rumi
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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शिकस्ता
नाव
समझ
कर
डुबोने
वाले
लोग
न
पा
सके
मुझे
साहिल
पे
खोने
वाले
लोग
ज़रा
सा
वक़्त
जो
बदला
तो
हम
पे
हँसने
लगे
हमारे
काँधे
पे
सर
रख
के
रोने
वाले
लोग
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Kashif Sayyed
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इज़हार-ए-इश्क़
उस
से
न
करना
था
'शेफ़्ता'
ये
क्या
किया
कि
दोस्त
को
दुश्मन
बना
दिया
Mustafa Khan Shefta
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रंग
बदला
यार
ने
वो
प्यार
की
बातें
गईं
वो
मुलाक़ातें
गईं
वो
चाँदनी
रातें
गईं
Hafeez Jalandhari
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ख़ामुशी
से
हुई
फ़ुग़ाँ
से
हुई
इब्तिदा
रंज
की
कहाँ
से
हुई
Ada Jafarey
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इक
और
हादसा
दिल-ए-अहमद
को
चाहिए
इक
वक़्त
हो
गया
है
हमें
कुछ
कहे
हुए
Faiz Ahmad
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फ़रेब-ए-हुस्न
से
दिल-ए-गु़दाज़
को
बिगाड़
कर
कहाँ
चली
गई
हो
मेरी
ज़िंदगी
उजाड़
कर
Faiz Ahmad
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तिरा
कलाम
याद
आया
तिरा
सलाम
याद
आया
जो
करना
ही
नहीं
मैंने
वो
एक
काम
याद
आया
जो
आता
ही
नहीं
मुझको
वो
एहतिराम
याद
आया
बढ़ाया
था
तिरी
जानिब
मुझे
वो
गाम
याद
आया
जो
देखा
कल
तुझे
मैंने
तो
इंतेकाम
याद
आया
जो
पूछा
जब
ख़ुशी
क्या
है
तो
तेरा
नाम
याद
आया
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Faiz Ahmad
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नहीं
मुमकिन
कि
रग-ए-जाँ
कोई
लर्ज़िश
न
करे
तू
मिरे
पास
हो
और
दिल
मिरा
शोरिश
न
करे
उसके
पैग़ाम
ने
उम्मीद
को
भी
तोड़
दिया
उसका
कहना
है
मुझे
पाने
की
कोशिश
न
करे
इक
अयादत
से
मिरा
हाल
बदल
सकती
है
उस
सेे
कहना
मिरे
हालात
की
पुर्सिश
न
करे
शहर
में
'अहमद'-ए-मग़रूर
से
मशहूर
हूँ
मैं
उस
सेे
कहना
कि
मिरे
ख़त
की
नुमाइश
न
करे
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Faiz Ahmad
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मैं
तिरी
मोहब्बत
की
कभी
भी
बर्बादी
नहीं
करूँंँगा
मर
मिटूंँगा
लेकिन
और
किसी
से
मैं
शादी
नहीं
करूँंँगा
Faiz Ahmad
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