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Faiz Ahmad
dil-e-naadaañ ko aql de raha hooñ
dil-e-naadaañ ko aql de raha hooñ | दिल-ए-नादाँ को अक़्ल दे रहा हूँ
- Faiz Ahmad
दिल-ए-नादाँ
को
अक़्ल
दे
रहा
हूँ
मय
को
मरहम
की
शक़्ल
दे
रहा
हूँ
जो
मोहब्बत
पनप
रही
मुझ
में
उसे
नफ़रत
की
शक़्ल
दे
रहा
हूँ
- Faiz Ahmad
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मेरी
जवानी
को
कमज़ोर
क्यूँ
समझते
हो
तुम्हारे
वास्ते
अब
भी
शबाब
बाक़ी
है
ये
और
बात
है
बोतल
ये
गिर
के
टूट
गई
मगर
अभी
भी
ज़रा
सी
शराब
बाक़ी
है
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Paplu Lucknawi
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तुम
यूँँ
ही
नाराज़
हुए
हो
वर्ना
मय-ख़ाने
का
पता
हम
ने
हर
उस
शख़्स
से
पूछा
जिस
के
नैन
नशीले
थे
Ghulam Mohammad Qasir
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इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
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Ammar Iqbal
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शराब
खींची
है
सब
ने
ग़रीब
के
ख़ूँ
से
तू
अब
अमीर
के
ख़ूँ
से
शराब
पैदा
कर
तू
इंक़लाब
की
आमद
का
इंतिज़ार
न
कर
जो
हो
सके
तो
अभी
इंक़लाब
पैदा
कर
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Asrar Ul Haq Majaz
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ये
मय-कदा
है
यहाँ
हैं
गुनाह
जाम-ब-दस्त
वो
मदरसा
है
वो
मस्जिद
वहाँ
मिलेगा
सवाब
Ali Sardar Jafri
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तुम्हारी
आँखों
की
तौहीन
है
ज़रा
सोचो
तुम्हारा
चाहने
वाला
शराब
पीता
है
Munawwar Rana
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प्रेम
की
गली
में
सब
शराब
लेकर
आए
थे
हम
बहुत
ख़राब
थे
किताब
लेकर
आए
थे
Aman Akshar
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शब
को
मय
ख़ूब
सी
पी
सुब्ह
को
तौबा
कर
ली
रिंद
के
रिंद
रहे
हाथ
से
जन्नत
न
गई
Jaleel Manikpuri
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शायद
शराब
पीके
तुम्हें
फ़ोन
मैं
करूँँ
बस
इसलिए
शराब
कभी
पी
नहीं
मैंने
Tanoj Dadhich
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बे-सबब
मरने
से
अच्छा
है
कि
हो
कोई
सबब
दोस्तों
सिगरेट
पियो
मय-ख़्वारियाँ
करते
रहो
Ameer Imam
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तुम
जो
आती
हो
जब
भी
पास
मिरे
क्यूँँ
उतर
जाते
हैं
लिबास
मिरे
Faiz Ahmad
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तुम्हारे
ग़म
को
मगर
ओढ़े
रक्खा
तीनों
दिन
मैं
चाहता
तो
मना
सकता
था
तेरे
बिन
ईद
Faiz Ahmad
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ईद
से
चंद
दिनों
पहले
ही
बिछड़े
थे
हम
यूँँ
शब-ए-कद्र
शब-ए-हिज्र
सी
गुज़री
मुझ
पर
Faiz Ahmad
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जिन
शाह
को
फ़क़त
हो
तलब
तख़्त-ओ-ताज
की
उनके
लिए
तो
तख़्त
के
मानी
है
राबिया
Faiz Ahmad
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वो
और
किसी
के
साथ
मनाएगी
इस
दफा
मेरे
लिए
तो
ईद
मुहर्रम
से
कम
नहीं
Faiz Ahmad
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