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Ahmad Waqas Mahrwi
ab koi dost to aisa bhi banaya jaa.e
ab koi dost to aisa bhi banaya jaa.e | अब कोई दोस्त तो ऐसा भी बनाया जाए
- Ahmad Waqas Mahrwi
अब
कोई
दोस्त
तो
ऐसा
भी
बनाया
जाए
जिस
को
हर
रंज-ओ-मुसीबत
में
बुलाया
जाए
तोड़
डाले
हैं
ज़माने
से
मरासिम
सारे
हाल-ए-दिल
किस
से
कहें
किस
को
सुनाया
जाए
मैं
ने
करनी
है
सितारों
से
कोई
राज़
की
बात
अभी
कुछ
और
मिरे
क़द
को
बढ़ाया
जाए
जिस
की
फ़ितरत
में
हो
बस
एक
ख़ुदा
की
पूजा
ऐसी
मिट्टी
से
कोई
बुत
न
बनाया
जाए
- Ahmad Waqas Mahrwi
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इक
तो
ये
नूर
उस
पे
मेरी
शर्म
भी
अलग
तू
सामने
रहा
तो
निगह
उठ
न
पाएगी
shaan manral
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मोहब्बत
के
इक़रार
से
शर्म
कब
तक
कभी
सामना
हो
तो
मजबूर
कर
दूँ
Akhtar Shirani
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तसव्वुर
में
भी
अब
वो
बे-नक़ाब
आते
नहीं
मुझ
तक
क़यामत
आ
चुकी
है
लोग
कहते
हैं
शबाब
आया
Hafeez Jalandhari
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हया
से
सर
झुका
लेना
अदास
मुस्कुरा
देना
हसीनों
को
भी
कितना
सहल
है
बिजली
गिरा
देना
Akbar Allahabadi
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कब
तलक
झाँकिए
उन
आँखों
में
जिन
में
कुछ
भी
न
हो
हया
के
सिवा
Shariq Kaifi
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जो
उन
को
लिपटा
के
गाल
चूमा
हया
से
आने
लगा
पसीना
हुई
है
बोसों
की
गर्म
भट्टी
खिंचे
न
क्यूँँकर
शराब-ए-आरिज़
Ahmad Husain Mail
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मुँह
पर
नक़ाब-ए-ज़र्द
हर
इक
ज़ुल्फ़
पर
गुलाल
होली
की
शाम
ही
तो
सहर
है
बसंत
की
Lala Madhav Ram Jauhar
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रूहों
के
पर्दा-पोश
गुनाहों
से
बे-ख़बर
जिस्मों
की
नेकियाँ
ही
गिनाता
रहा
हूँ
मैं
Jaun Elia
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काबा
किस
मुँह
से
जाओगे
'ग़ालिब'
शर्म
तुम
को
मगर
नहीं
आती
Mirza Ghalib
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जो
तेरी
बाँहों
में
हँसती
रही
है
खेली
है
वो
लड़की
राज़
नहीं
है
कोई
पहेली
है
हाँ
मेरा
हाथ
पकड़
कर
झटक
दिया
उसने
सहारा
दे
के
बताया
कि
तू
अकेली
है
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Tajdeed Qaiser
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अजब
नहीं
कि
ज़मीं
पाँव
से
सरक
जाए
हमारे
सर
पे
कई
दिन
से
आसमाँ
भी
नहीं
शरीफ़
रह
के
गुज़ारी
गई
जवानी
का
अगरचे
फ़ाएदा
कम
है
मगर
ज़ियाँ
भी
नहीं
उसे
क़रीब
से
देखे
हुए
ज़माना
हुआ
सुना
है
देखने
वालों
से
अब
जवाँ
भी
नहीं
मैं
कोई
देर
को
आया
हूँ
इस
ख़राबे
में
मिरी
नशिस्त
नहीं
है
मिरा
मकाँ
भी
नहीं
'वक़ास'
ले
के
कहाँ
जाए
अपनी
ग़ुर्बत
को
कि
इस
लिए
तो
कोई
दूसरा
जहाँ
भी
नहीं
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Ahmad Waqas Mahrwi
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असीर-ए-इश्क़
हूँ
दर्द-ए-निहाँ
सोने
नहीं
देता
मुझे
डसती
है
तन्हाई
मकाँ
सोने
नहीं
देता
जो
बख़्शे
थे
बहारों
ने
अभी
वो
ज़ख़्म
ताज़ा
हैं
कि
बू-ए-गुल
तिलिस्म-ए-गुलसिताँ
सोने
नहीं
देता
मुझे
आफ़ाक़
की
सब
मंज़िलें
तस्ख़ीर
करनी
हैं
यही
जोश-ए-जुनूँ
अज़्म-ए-जवाँ
सोने
नहीं
देता
न
वो
सोचों
से
उतरेगा
न
आँखें
चैन
पाएँगी
ख़याल-ए-पैकर-ए-हुस्न-ए-बुताँ
सोने
नहीं
देता
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Ahmad Waqas Mahrwi
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मौत
है
और
मौत
के
ख़दशात
हैं
सनसनी
है
अन-दिखे
ख़दशात
हैं
ख़ौफ़
फैला
है
वबा
के
रूप
में
क़र्या
क़र्या
पल
रहे
ख़दशात
हैं
गर
कोई
तिरयाक़
है
वो
है
यक़ीं
ज़हर
की
सूरत
लिए
ख़दशात
हैं
इस
सदी
के
आदमी
तो
हैं
ख़ुदा
तू
ने
ही
पैदा
किए
ख़दशात
हैं
दायरा
दर
दायरा
तश्कीक
है
बे-तरह
फैले
हुए
ख़दशात
हैं
तुझ
में
हिम्मत
है
तो
इन
को
मात
दे
ऐ
नए
इंसाँ
नए
ख़दशात
हैं
वो
गली
के
मोड़
पर
है
मुंतज़िर
डर
रहा
हूँ
मैं
मिरे
ख़दशात
हैं
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Ahmad Waqas Mahrwi
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