tu bigadta bhi hai khaas apne hi andaaz ke saath | तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ

  - Ahmad Nadeem Qasmi
तूबिगड़ताभीहैख़ासअपनेहीअंदाज़केसाथ
फूलखिलतेहैंतिरेशोला-ए-आवाज़केसाथ
एकबारऔरभीक्यूँँअर्ज़-ए-तमन्नाकरूँँ
कितूइंकारभीकरताहैअजबनाज़केसाथ
लयजोटूटीतोसदाआईशिकस्त-ए-दिलकी
रग-ए-जाँकाकोईरिश्ताहैरग-ए-साज़केसाथ
तूपुकारेतोचमकउठतीहैंमेरीआँखें
तेरीसूरतभीहैशामिलतिरीआवाज़केसाथ
जबतकअर्ज़ांहैज़मानेमेंकबूतरकालहू
ज़ुल्महैरब्तरखूँगरकिसीशहबाज़केसाथ
पस्तइतनीतोथीमेरीशिकस्तयारो
परसमेटेहैंमगरहसरतपर्वाज़केसाथ
पहरेबैठेहैंक़फ़सपरकिहैसय्यादकोवहम
पर-शिकस्तोंकोभीइकरब्तहैपर्वाज़केसाथ
उम्रभरसंग-ज़नीकरतेरहेअहल-ए-वतन
येअलगबातकिदफ़नाएँगेए'ज़ाज़केसाथ
  - Ahmad Nadeem Qasmi
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