nishaan manzil ka batlaaya na mujh ko hum-safar jaana | निशाँ मंज़िल का बतलाया न मुझ को हम-सफ़र जाना

  - Ahmad Adil
निशाँमंज़िलकाबतलायामुझकोहम-सफ़रजाना
तज़ब्ज़ुबमेंपड़ाहैवोजिसेमैंनेख़िज़रजाना
नज़रमेरीबसीरतकोसदामहदूदरखतीहै
पस-ए-मंज़रनहींदेखाफ़क़तपेश-ए-नज़रजाना
जहाँतक़दीरलेजाएवहाँरस्तेनहींजाते
कियाथारुख़इधरकाक्यूँँलिखाथाजबउधरजाना
हवालाज़िंदगीकाभीतुम्हारीज़ुल्फ़जैसाहै
बिखरनाफिरसँवरजानासँवरनाफिरबिखरजाना
जुनूँकीराहकोअबतकसमझपाएनहींसाहब
किअपनेजिस्मकोढाकरफ़क़तजाँसेगुज़रजाना
डुबोयाजिसनेकश्तीकोउसेहीना-ख़ुदासमझे
दिएथेजिसनेसारेदुखउसीकोचारा-गरजाना
उन्हींतारीकराहोंसेगुज़रनाहैतुम्हें'आदिल'
चराग़-ए-जाँजलाकरतुमबिलाख़ौफ़-ओ-ख़तरजाना
  - Ahmad Adil
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