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Afzal Sultanpuri
main alam le chaloon sadaakat ka
main alam le chaloon sadaakat ka | मैं अलम ले चलूँ सदाकत का
- Afzal Sultanpuri
मैं
अलम
ले
चलूँ
सदाकत
का
यार
परचम
उड़े
मोहब्बत
का
हम
फ़कीरी
करें
गुज़ारें
दिन
क्या
करेंगे
भला
ख़िलाफ़त
का
रोज़
हर
रात
चैन
से
सोये
तोड़
दूँगा
नशा
मुसीबत
का
रोज़
छुप
कर
तलाशता
क्या
है
मैं
मुहाफ़िज़
रहा
अमानत
का
- Afzal Sultanpuri
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न
तीर्थ
जा
कर
न
धर्म
ग्रंथो
का
सार
पा
कर
सुकूँ
मिला
है
मुझे
तो
बस
तेरा
प्यार
पा
कर
ग़रीब
बच्चे
किताब
पढ़
कर
सँवर
रहे
हैं
अमीर
लड़के
बिगड़
रहे
हैं
दुलार
पा
कर
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Alankrat Srivastava
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सुकून
ए
क़ल्ब
होता
है
मुयस्सर
तेरा
जब
नाम
आता
है
लबों
पर
Kiran K
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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यूँँ
देखिए
तो
आँधी
में
बस
इक
शजर
गया
लेकिन
न
जाने
कितने
परिंदों
का
घर
गया
जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
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Rajesh Reddy
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बे
तेरे
क्या
वहशत
हम
को
तुझ
बिन
कैसा
सब्र-ओ-सुकूँ
तू
ही
अपना
शहर
है
जानी
तू
ही
अपना
सहरा
है
Ibn E Insha
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बैठे
हैं
चैन
से
कहीं
जाना
तो
है
नहीं
हम
बे-घरों
का
कोई
ठिकाना
तो
है
नहीं
तुम
भी
हो
बीते
वक़्त
के
मानिंद
हू-ब-हू
तुम
ने
भी
याद
आना
है
आना
तो
है
नहीं
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Rehman Faris
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जो
चराग़
सारे
बुझा
चुके
उन्हें
इंतिज़ार
कहाँ
रहा
ये
सुकूँ
का
दौर-ए-शदीद
है
कोई
बे-क़रार
कहाँ
रहा
Ada Jafarey
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हुस्न
उनका
सादगी
में
कुछ
अलग
महका
किया
मैंने
धड़कन
से
कहा
धड़को
मगर
आराम
से
Ishq Allahabadi
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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हमारी
मौत
पर
बेशक़
ज़माना
आएगा
रोने
मगर
ज़िंदा
हैं
जब
तक
चैन
से
जीने
नहीं
देगा
Astitwa Ankur
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हाल
कैसा
बना
के
निकले
हो
ख़ैर
अच्छी
बला
से
निकले
हो
चैन
की
साँस
लो
मिरी
मानो
अपनी
इज़्ज़त
बचा
के
निकले
हो
गर्द-आलूद
हो
गई
हसरत
इश्क़
में
चोट
खा
के
निकले
हो
एक
पल
में
उजाड़
दी
दुनिया
घर
से
तुम
क्या
बता
के
निकले
हो
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Afzal Sultanpuri
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मोहब्बत
हो
गई
आसान
जानी
मगर
क्यूँ
ले
रही
है
जान
जानी
Afzal Sultanpuri
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सब
ख़तों
को
जला
दिया
मैंने
और
उनको
भुला
दिया
मैंने
Afzal Sultanpuri
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ज़िंदगी
को
अज़ाब
कर
लेना
मौत
से
भी
ख़राब
कर
लेना
Afzal Sultanpuri
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उनके
आने
का
वक़्त
हो
गया
है
ईद
मनाने
का
वक़्त
हो
गया
है
Afzal Sultanpuri
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