padh-likh ga.e magar kisi qaabil nahin hue | पढ़-लिख गए मगर किसी क़ाबिल नहीं हुए

  - Prashant Kumar
पढ़-लिखगएमगरकिसीक़ाबिलनहींहुए
मेरेवतनकेलोगअभी'आक़िलनहींहुए
मारेलताड़ेफिररहेसारेजहानमें
लेकिनहमारीबज़्ममेंशामिलनहींहुए
जोज़िंदगीकेतौरतरीक़ेकोपढ़सको
तुमलोगइतनेतोअभीक़ाबिलनहींहुए
डंडेसेहाँकतेहोसभीकोजबएकही
मय्यतमेंक्यूँँफ़क़ीरकीशामिलनहींहुए
सबकोजबइकनिगाहसेहीदेखतेहोतुम
चौखटपेक्यूँँचमारकीदाख़िलनहींहुए
मय्यतमेंआसमानज़मींसबशरीकथे
दैर-ओ-हरमकेलोगहीशामिलनहींहुए
घुसतेहैंझोपड़ेमेंतोछातीकोतानकर
परकाख़-ए-उमरामेंकभीदाख़िलनहींहुए
हमजैसेहरफ़क़ीरकीक़िस्मतसँवारदो
बेकारमेंतुमइतनेभीकामिलनहींहुए
ख़ुशियाँलुटाकररहेसारेजहानमें
कुछग़मथेख़ुश-नसीबसेहासिलनहींहुए
  - Prashant Kumar
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