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Adarsh Akshar
jal
jal | जल्दी दुनियादारी समझो
- Adarsh Akshar
जल्दी
दुनियादारी
समझो
तरकीबें
तुम
सारी
समझो
जग
को
बेहतर
करना
है
तो
अपनी
ज़िम्मेदारी
समझो
सबके
हिस्से
आ
जाता
है
ग़म
की
कारोबारी
समझो
बात
तुम्हारी
समझी
हमने
अब
तुम
बात
हमारी
समझो
ग़ज़लें
नज़्में
पढ़ते
हो
तो
अपनी
पक्की
यारी
समझो
- Adarsh Akshar
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जो
सावन
होते
सूखा,
उस
फूल
पे
लानत
हो
मुझ
पे
लानत,
तेरे
होते,
यार
उदासी
है
Siddharth Saaz
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मेरा
हर
दिन
तेरी
फ़ुर्क़त
में
बसर
होता
है
यार
होना
तो
नहीं
चाहिए,
पर
होता
है
Harman Dinesh
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बात
करो
रूठे
यारों
से
सन्नाटों
से
डर
जाते
हैं
प्यार
अकेला
जी
लेता
है
दोस्त
अकेले
मर
जाते
हैं
Kumar Vishwas
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जैसे
पतवार
सफ़ीने
के
लिए
होते
हैं
दोस्त
अहबाब
तो
जीने
के
लिए
होते
हैं
इश्क़
में
कोई
तमाशा
नहीं
करना
होता
अश्क
जैसे
भी
हों
पीने
के
लिए
होते
हैं
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Khalid Nadeem Shani
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कोई
दिक़्क़त
नहीं
है
गर
तुम्हें
उलझा
सा
लगता
हूँ
मैं
पहली
मर्तबा
मिलने
में
सबको
ऐसा
लगता
हूँ
ज़रूरी
तो
नहीं
हम
साथ
हैं
तो
कोई
चक्कर
हो
वो
मेरी
दोस्त
है
और
मैं
उसे
बस
अच्छा
लगता
हूँ
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Ali Zaryoun
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पहले
रूठा
यार
मनाना
होता
है
फिर
कोई
त्योहार
मनाना
होता
है
Hasan Raqim
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अब
दोस्त
कोई
लाओ
मुक़ाबिल
में
हमारे
दुश्मन
तो
कोई
क़द
के
बराबर
नहीं
निकला
Munawwar Rana
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हालत
जो
हमारी
है
तुम्हारी
तो
नहीं
है
ऐसा
है
तो
फिर
ये
कोई
यारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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मैं
दिल
को
सख़्त
करके
उस
गली
जा
तो
रहा
हूँ
दोस्त
करूँँगा
क्या
अगर
वो
ही
शरारत
पर
उतर
आया
Harsh saxena
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कब
लौटा
है
बहता
पानी
बिछड़ा
साजन
रूठा
दोस्त
हम
ने
उस
को
अपना
जाना
जब
तक
हाथ
में
दामाँ
था
Ibn E Insha
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गर
बोला
होता
प्यार
से
लड़
लेते
हम
संसार
से
वो
जलने
से
डरते
नहीं
जो
खेलते
अंगार
से
सच
में
बहुत
कुछ
सीखता
इंसान
अपनी
हार
से
जो
जो
क़लम
कर
सकती
है
होगा
न
वो
तलवार
से
उम्मीद
रखता
है
नहीं
'अक्षर'
किसी
सरकार
से
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न
दोस्ती
है
किसी
से
मेरी
न
है
मिरी
दुश्मनी
ज़रा
भी
ये
ज़िंदगी
है
गुज़ारी
मैंने
तो
सिर्फ़
ख़ुद
से
ही
बात
करते
Adarsh Akshar
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करते
हैं
जो
बंदगी
रोज़
रहती
उन
पर
रौशनी
रोज़
बैठना
मत
मान
के
हार
है
बदलती
ज़िंदगी
रोज़
शा'इरी
की
लत
लगी
थी
कर
न
पाए
नौकरी
रोज़
एक
ऐसे
मोड़
पर
हूँ
अपने
लगते
अजनबी
रोज़
वा'दा
कर
के
ख़ुद
से
ही
अब
भूल
जाता
आदमी
रोज़
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हट
के
सब
सेे
सोचता
है
यानी
बिल्कुल
सर-फिरा
है
कुछ
अलग
करने
से
ही
तो
आता
जीवन
में
मज़ा
है
अंत
में
होता
वही
है
भाग्य
में
जो
कुछ
लिखा
है
इश्क़
के
दरिया
में
सबको
एक
दिन
तो
डूबना
है
जीत
उसकी
तय
है
'अक्षर'
पास
जिसके
हौसला
है
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हो
जब
तलक
बे-नाम
तुम
करना
नहीं
आराम
तुम
गढ़ता
है
वो
आँखों
में
तो
क्यूँ
लेते
उसका
नाम
तुम
नफ़रत
के
इस
माहौल
में
दो
प्यार
का
पैग़ाम
तुम
है
स्वर्ग
तुमको
देखना
तो
जाओ
चारों
धाम
तुम
गिन
कर
के
गुठली
होगा
क्या
चुप
चाप
खाओ
आम
तुम
रावण
दिखे
दोबारा
तो
बन
जाना
झट
से
राम
तुम
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