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Abhishek Dhakad
khwahishon ka gala dabana hai
khwahishon ka gala dabana hai | ख़्वाहिशों का गला दबाना है
- Abhishek Dhakad
ख़्वाहिशों
का
गला
दबाना
है
छोड़ती
कब
है
नौकरी
मुझको
- Abhishek Dhakad
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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इसी
लिए
तो
है
ज़िंदाँ
को
जुस्तुजू
मेरी
कि
मुफ़लिसी
को
सिखाई
है
सर-कशी
मैं
ने
Ali Sardar Jafri
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कब
करे
ये
दिल
मुहब्बत
नौकरी
दिन
खा
रही
है
Ravi 'VEER'
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मुझ
को
ख़्वाहिश
है
उसी
शान
की
दिवाली
की
लक्ष्मी
देश
में
उल्फ़त
की
शब-ओ-रोज़
रहे
देश
को
प्यार
से
मेहनत
से
सँवारें
मिल
कर
अहल-ए-भारत
के
दिलों
में
ये
'कँवल'
सोज़
रहे
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Kanval Dibaivi
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मुफ़लिसी
थी
और
हम
थे
घर
के
इकलौते
चराग़
वरना
ऐसी
रौशनी
करते
कि
दुनिया
देखती
Kashif Sayyed
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हँस
के
फ़रमाते
हैं
वो
देख
के
हालत
मेरी
क्यूँँ
तुम
आसान
समझते
थे
मोहब्बत
मेरी
Ameer Minai
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अजीब
हालत
है
जिस्म-ओ-जाँ
की
हज़ार
पहलू
बदल
रहा
हूँ
वो
मेरे
अंदर
उतर
गया
है
मैं
ख़ुद
से
बाहर
निकल
रहा
हूँ
Azm Shakri
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तसव्वुर
तजरबा
तेवर
तमन्ना
और
तन्हाई
मिलेंगे
फूल
सब
इस
में
ग़ज़ल
गुलदान
है
यारों
पढ़ाई
नौकरी
शादी
फिर
उसके
बाद
दो
बच्चे
हमारी
ज़िन्दगी
इतनी
कहाँ
आसान
है
यारों
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Tanoj Dadhich
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हाल
ये
है
कि
अपनी
हालत
पर
ग़ौर
करने
से
बच
रहा
हूँ
मैं
Jaun Elia
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कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
Adil Mansuri
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जबसे
फ़ुर्क़त
तेरी
गुज़ारी
है
ये
तबीअत
बहुत
ही
भारी
है
तेरी
यादों
का
ये
सबब
है,अब
सिर्फ़
सिगरेट
से
ही
यारी
है
किसकी
हालत
पे
हँस
रहे
थे
हम
हाँ
वो
हालत
तो
अब
हमारी
है
एक
लड़की
के
पीछे
जानेजाँ
हमने
सारी
ये
दुनिया
हारी
है
जिसने
नक़्शा
मेरा
बिगाड़ा
है
हाँ
वो
लड़की
बहुत
ही
प्यारी
है
इश्क़
कितनो
को
खा
गया
धाकड़
अब
तो
शायद
तेरी
ही
बारी
है
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Abhishek Dhakad
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जो
तुम्हारा
पता
करे
कोई
फिर
तो
क्या
ही
वफ़ा
करे
कोई
कैसे
अब
तेरे
हिज्र
से
निकलूँ
हक़
में
मेरे
दु'आ
करे
कोई
जिसकी
ख़ातिर
ये
हाथ
काटे
हैं
उसको
कैसे
जुदा
करे
कोई
अब
तो
दिखता
नहीं
गली
में
वो
बेसबब
क्यूँ
फिरा
करे
कोई
ज़िंदा
रहने
का
छिन
गया
मक़सद
ध्यान
अब
क्यूँ
रखा
करे
कोई
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Abhishek Dhakad
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झूट
से
मुझको
तू
रिहा
करना
करना
ही
है
तो
बस
वफ़ा
करना
हिज्र
में
तेरे
मिल
सके
राहत
आशिक़ों
के
लिए
दु'आ
करना
एक
मौजूद
है
हुनर
उस
में
छोटी
सी
बात
को
बड़ा
करना
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Abhishek Dhakad
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किसी
भी
हुस्न
की
ख़ातिर
इबादत
ही
नहीं
करते
जो
बंदे
टूट
जाते
हैं
मुहब्बत
ही
नहीं
करते
Abhishek Dhakad
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ख़ामुशी
और
फिर
ये
हालत
है
सच
कहूँ
तो
तेरी
ज़रूरत
है
आप
को
देख
साफ़
दिखता
है
ये
मुहब्बत
नहीं
इनायत
है
तू
कभी
फ़ोन
तक
नहीं
करता
सबको
मुझ
सेे
यही
शिकायत
है
उस
सेे
तुमको
वफ़ा
की
है
उम्मीद
और
नए
दौर
की
वो
औरत
है
इस
क़दर
तन्हा
हूँ
की
मैं
जैसे
ये
उदासी
ही
मेरी
क़िस्मत
है
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Abhishek Dhakad
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