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Ajeetendra Aazi Tamaam
dar se rakh dii hai rooh tak girvi
dar se rakh dii hai rooh tak girvi | डर से रख दी है रूह तक गिरवी
- Ajeetendra Aazi Tamaam
डर
से
रख
दी
है
रूह
तक
गिरवी
एक
तितली
ने
पर
बचाने
को
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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प्यार
की
जोत
से
घर
घर
है
चराग़ाँ
वर्ना
एक
भी
शम्अ
न
रौशन
हो
हवा
के
डर
से
Shakeb Jalali
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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डर
मुझे
मेरी
मुहब्बत
एक
दिन
खो
जाएगी
यार
मुझको
लग
रहा
वो
ग़ैर
की
हो
जाएगी
मैं
सभी
वादे
पुराने
ही
निभाते
जाऊँगा
और
वो
जाकर
किसी
की
बाँह
में
सो
जाएगी
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Ravi 'VEER'
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तो
क्या
उसको
मैं
होंठों
से
बजाऊँ
तिरे
दर
पे
जो
घंटी
लग
गई
है
चराग़
उसने
मिरे
लौटा
दिए
हैं
अब
उसके
घर
में
बिजली
लग
गई
है
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Fahmi Badayuni
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इस
ख़ौफ़
में
कि
ख़ुद
न
भटक
जाएँ
राह
में
भटके
हुओं
को
राह
दिखाता
नहीं
कोई
Anwar Taban
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उसे
ज़ियादा
ज़रूरत
थी
घर
बसाने
की
वो
आ
के
मेरे
दर-ओ-बाम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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आँख
की
बेबसी
दिल
का
डर
देखना
तुम
किसी
दिन
ग़रीबों
का
घर
देखना
Alankrat Srivastava
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बच्चों
तुम्हीं
बताओ
कि
मईया
कहाँ
गई
रस्ते
में
छोड़कर
ये
सुरईया
कहाँ
गई
इन
रक्षकों
के
ख़ौफ़
से
घर
में
छुपा
हूँ
मैं
पूछेंगे
ये
ज़रूर
कि
गईया
कहाँ
गई
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Paplu Lucknawi
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चले
हैं
हिंद
के
सैनिक
ज़फ़र
को
कटा
लेंगे
झुकाएँगे
न
सर
को
कि
सूखे
टुंड
पर
लगते
नहीं
फल
गिरा
दो
काट
दो
अब
इस
शजर
को
नहीं
उस्ताद
कोई
उनके
जैसा
जो
समझाए
सुख़न
के
हर
भँवर
को
ग़ज़ल
है
मुंतज़िर
इस्लाह
को
इक
मिलो
गर
तुम
तो
ये
कहना
"समर"
को
दो
रोटी
और
बस
कपड़ा
मकान
इक
नहीं
काफ़ी
ओ
दीवाने
गुज़र
को
तुझे
लड़ना
है
प्रतिपल
ज़िंदगी
से
मिला
नज़रें
डरा
दे
अपने
डर
को
जुदा
होकर
वो
देखो
इक
सफ़र
से
चला
है
दिल
मिरा
फिर
इक
सफ़र
को
मोहब्बत
के
मरीजों
पर
मिरी
जाँ
तरस
आए
हर
इक
दीवार
दर
को
दवाएँ
फेल
होती
जा
रही
हैं
सभी
मिलकर
दु'आ
भेजो
असर
को
मैं
अपनी
ज़िंदगी
में
ऐसा
उलझा
लगी
दीमक
मेरे
दस्त-ए-हुनर
को
तुम्हें
गर
सुर्ख़र-रू
होना
है
यारो
जला
दो
फूँक
दो
दिल
के
नगर
को
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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दुश्मनी
दुश्मनी
ही
देती
है
सर
के
बदले
में
सर
नहीं
देती
Ajeetendra Aazi Tamaam
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रहते
हैं
अपने
आप
से
कुछ
बे-ख़बर
से
हम
जब
से
हुए
हैं
रू-ब-रू
दर्द-ए-जिगर
से
हम
Ajeetendra Aazi Tamaam
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दिवाने
पन
की
अपने
भी
कोई
सीमा
नहीं
यारो
जुनूँ
में
ख़ुद
ही
ख़ुद
से
ख़ुद
का
ही
सर
फोड़
लेते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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दर्द
देता
है
ज़माना
उनको
जो
ज़माने
से
जुदा
होते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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