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Ajeetendra Aazi Tamaam
chale hain hind ke sainik zafar ko
chale hain hind ke sainik zafar ko | चले हैं हिंद के सैनिक ज़फ़र को
- Ajeetendra Aazi Tamaam
चले
हैं
हिंद
के
सैनिक
ज़फ़र
को
कटा
लेंगे
झुकाएँगे
न
सर
को
कि
सूखे
टुंड
पर
लगते
नहीं
फल
गिरा
दो
काट
दो
अब
इस
शजर
को
नहीं
उस्ताद
कोई
उनके
जैसा
जो
समझाए
सुख़न
के
हर
भँवर
को
ग़ज़ल
है
मुंतज़िर
इस्लाह
को
इक
मिलो
गर
तुम
तो
ये
कहना
"समर"
को
दो
रोटी
और
बस
कपड़ा
मकान
इक
नहीं
काफ़ी
ओ
दीवाने
गुज़र
को
तुझे
लड़ना
है
प्रतिपल
ज़िंदगी
से
मिला
नज़रें
डरा
दे
अपने
डर
को
जुदा
होकर
वो
देखो
इक
सफ़र
से
चला
है
दिल
मिरा
फिर
इक
सफ़र
को
मोहब्बत
के
मरीजों
पर
मिरी
जाँ
तरस
आए
हर
इक
दीवार
दर
को
दवाएँ
फेल
होती
जा
रही
हैं
सभी
मिलकर
दु'आ
भेजो
असर
को
मैं
अपनी
ज़िंदगी
में
ऐसा
उलझा
लगी
दीमक
मेरे
दस्त-ए-हुनर
को
तुम्हें
गर
सुर्ख़र-रू
होना
है
यारो
जला
दो
फूँक
दो
दिल
के
नगर
को
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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तुझे
कैसे
इल्म
न
हो
सका
बड़ी
दूर
तक
ये
ख़बर
गई
तिरे
शहर
ही
की
ये
शाएरा
तिरे
इंतिज़ार
में
मर
गई
Mumtaz Naseem
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चैन
की
बाँसुरी
बजाइये
आप
शहर
जलता
है
और
गाइये
आप
हैं
तटस्थ
या
कि
आप
नीरो
हैं
असली
सूरत
ज़रा
दिखाइये
आप
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Gorakh Pandey
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बदन
लिए
तलाशता
फिरू
हूँ
रात
दिन
उसे
सुना
है
जान
भी
मेरी
कहीं
इसी
शहर
में
है
Bhaskar Shukla
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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घर
पहुँचता
है
कोई
और
हमारे
जैसा
हम
तेरे
शहरस
जाते
हुए
मर
जाते
हैं
Abbas Tabish
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एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
Ammar Iqbal
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देखें
क़रीब
से
भी
तो
अच्छा
दिखाई
दे
इक
आदमी
तो
शहर
में
ऐसा
दिखाई
दे
Zafar Gorakhpuri
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यूँँ
ही
नहीं
बस्ती
जली,
यूँँ
ही
नहीं
सब
लड़
मरे
कुछ
लोग
आए
बाहरी,
फिर
मज़हबी
दंगा
हुआ
Ankit Raj
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हम
घूम
चुके
बस्ती
बन
में
इक
आस
की
फाँस
लिए
मन
में
Ibn E Insha
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जितने
भी
अपने
थे
सब
के
सब
सयाने
हो
गए
गर्दिश-ए-पैहम
ने
हमको
बेसहारा
कर
दिया
Ajeetendra Aazi Tamaam
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हसरतें
ख़्वाब
और
परेशानी
ये
सभी
ज़िंदगी
के
पहलू
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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जो
तुझको
बे-वफ़ा
होना
है
तो
सुन
न
तुझ
सेे
मैं
कहूँगा
बा
वफ़ा
हो
हाँ
जो
रुकना
है
तो
सब
छोड़
नाटक
अगर
जाना
है
तो
फिर
चल
दफ़ा
हो
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नहीं
उस्ताद
कोई
उनके
जैसा
जो
समझाए
सुख़न
के
हर
भँवर
को
ग़ज़ल
है
मुंतज़िर
इस्लाह
को
इक
मिलो
गर
तुम
तो
ये
कहना
"समर"
को
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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फ़र्क़
रहने
दो
मिरी
जाँ
हम
में
तुम
में
कौन
जाने
अगले
ही
पल
क्या
हो
जाए
Ajeetendra Aazi Tamaam
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