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Aatish Indori
tumse maine kuchh nahin chaaha muhabbat ke siva
tumse maine kuchh nahin chaaha muhabbat ke siva | तुम सेे मैंने कुछ नहीं चाहा मुहब्बत के सिवा
- Aatish Indori
तुम
सेे
मैंने
कुछ
नहीं
चाहा
मुहब्बत
के
सिवा
सब
मिला
तुम
सेे
मुझे
शोना
मुहब्बत
के
सिवा
- Aatish Indori
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यार
तुम
बद-नसीब
कैसे
हो
बाप
है
फिर
गरीब
कैसे
हो
आप
अटके
शिया
और
सुन्नी
में
फिर
ख़ुदा
के
क़रीब
कैसे
हो
ख़ुद
की
थाली
में
छेद
कर
डाला
यार
इतने
अजीब
कैसे
हो
बूढ़े
बरगद
की
छाँव
में
हो
तुम
बेटे
फिर
ग़म-नसीब
कैसे
हो
तुम
सेे
पूरी
हुई
कहानी
यह
दोस्त
हो
तुम
रक़ीब
कैसे
हो
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जश्न
की
वजह
यार
देता
हूँ
हौसला
हूँ
बहार
देता
हूँ
हाँ
तेरा
इंतिज़ार
कर
लूँगा
यूँँ
ही
घंटों
गुज़ार
देता
हूँ
जब
भी
तन्हा
हो
तो
चले
आना
वक़्त
अपना
उधार
देता
हूँ
जिस्म
तक
बात
रखनी
है
ओके
तो
मुखौटा
उतार
देता
हूँ
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ज़माना
इक
जिसे
अपना
बनाने
में
लगा
है
वही
इक
शख़्स
अब
मुझको
भुलाने
में
लगा
है
लगे
थे
एक
दो
पल
और
मोहब्बत
हो
गई
थी
ज़माना
पर
ज़माने
को
मनाने
में
लगा
है
मोहब्बत
को
भले
कहता
है
नेमत
ये
ज़माना
मोहब्बत
को
जहाँ
से
पर
मिटाने
में
लगा
है
कोई
'आशिक़
नहीं
है
वो
तो
दीवाना
है
'आतिश'
ग़मों
से
घर
क़रीने
से
सजाने
में
लगा
है
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Aatish Indori
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जाने
कैसे
कैसे
लोग
ये
महफ़िल
में
आ
जाते
हैं
पीना
वीना
तो
है
नहीं
चखना
लेकिन
खा
जाते
हैं
Aatish Indori
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मुहब्बत
करके
जाना
है
मुहब्बत
क्यूँँ
नहीं
करनी
ब-मुश्किल
जाना
ये
वाली
हिमाक़त
क्यूँँ
नहीं
करनी
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