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Aatish Indori
zamaana ik jise apna banaane men laga hai
zamaana ik jise apna banaane men laga hai | ज़माना इक जिसे अपना बनाने में लगा है
- Aatish Indori
ज़माना
इक
जिसे
अपना
बनाने
में
लगा
है
वही
इक
शख़्स
अब
मुझको
भुलाने
में
लगा
है
लगे
थे
एक
दो
पल
और
मोहब्बत
हो
गई
थी
ज़माना
पर
ज़माने
को
मनाने
में
लगा
है
मोहब्बत
को
भले
कहता
है
नेमत
ये
ज़माना
मोहब्बत
को
जहाँ
से
पर
मिटाने
में
लगा
है
कोई
'आशिक़
नहीं
है
वो
तो
दीवाना
है
'आतिश'
ग़मों
से
घर
क़रीने
से
सजाने
में
लगा
है
- Aatish Indori
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कैसी
बीती
रात
कहने
की
नहीं
क्या
हुई
है
बात
कहने
की
नहीं
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दूर
रहिए
मेरी
कहानी
से
आप
गुज़रे
नहीं
जवानी
से
हम
भी
निकलेंगे
इस
कहानी
से
आप
गर
निकले
ज़िंदगानी
से
आप
पार्टी
नहीं
हो
मुंसिफ़
हो
फिर
भी
रोकोगे
सच-बयानी
से
यूँँ
इधर
से
उधर
न
भटकाओ
तुम
कहानी
कहो
रवानी
से
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चैन
पाने
के
लिए
मैंने
लगा
रक्खी
है
ज़िंदगी
तूने
बड़ी
गंध
मचा
रक्खी
है
जितने
आते
हैं
तुम्हें
उतने
दिखाओ
कर्तब
मैंने
आँखों
पे
हरी
पट्टी
चढ़ा
रक्खी
है
चाह
कर
भी
तुझे
अपना
नहीं
सकता
हूँ
मैं
बद-ख़यालों
ने
बड़ी
भीड़
लगा
रक्खी
है
हाल
है
तेरा
भी
मेरे
ही
सरीखा
शायद
नाव
टूटी
है
मगर
पाल
चढ़ा
रक्खी
है
जानता
अच्छे
से
हूँ
यह
कि
ठगा
जाऊँगा
मैंने
उम्मीद
ज़माने
से
लगा
रक्खी
है
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भला
वो
काहे
रोएगा
जिसे
ये
याद
होगा
कोई
वाशाद
होगा
तो
कोई
नाशाद
होगा
कोई
बर्बाद
होगा
तो
कोई
आबाद
होगा
सदा
ज़ीरो,
घटाने
जोड़ने
के
बाद
होगा
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शाम
को
रोज़
बुलंदी
से
उतर
आते
हैं
जो
परिंदे
हैं
वो
तो
लौट
के
घर
आते
हैं
उम्र
भर
साथ
निभाने
को
कोई
कहता
है
तब
मुहब्बत
में
अगर
और
मगर
आते
हैं
उनको
व्यापार
ही
व्यापार
नज़र
आता
है
लोग
जो
जिस्म
की
गलियों
से
गुज़र
आते
हैं
बे-वफ़ाओं
की
बताता
हूँ
अनूठी
पहचान
वे
ज़ियादा
ही
वफ़ादार
नज़र
आते
हैं
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