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Aatish Indori
vo kahaan sabko khaas karta hai
vo kahaan sabko khaas karta hai | वो कहाँ सबको ख़ास करता है
- Aatish Indori
वो
कहाँ
सबको
ख़ास
करता
है
इक
मुझे
ही
उदास
करता
है
एक
ही
क्लास
में
रखे
है
मुझे
दूसरों
को
तो
पास
करता
है
ढूढ़
लाता
है
बद-ख़यालों
को
ख़ुद
को
फिर
बद-हवा
से
करता
है
- Aatish Indori
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पेड़
को
काटने
वाले
क्या
जाने
दुख
हम
गले
लग
नहीं
सकते
दीवार
से
Neeraj Neer
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पहले
तो
वो
हाथ
पकड़कर
कमरे
से
बाहर
लाया
और
फिर
मुझको
इस
दुनिया
में
यार
अकेला
छोड़
गया
Tanoj Dadhich
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सीधा-साधा
डाकिया
जादू
करे
महान
एक
ही
थैले
में
भरे
आँसू
और
मुस्कान
Nida Fazli
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मैं
अँधेरों
से
बचा
लाया
था
अपने
आप
को
मेरा
दुख
ये
है
मिरे
पीछे
उजाले
पड़
गए
Rahat Indori
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रूमाल
ले
लिया
है
किसी
माह-जबीन
से
कब
तक
पसीना
पोंछते
हम
आस्तीन
से
ये
आँसुओं
के
दाग़
हैं,
आँसू
ही
धोएँगे
ये
दाग़
धुल
न
पाएँगे
वाशिंग
मशीन
से
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Waseem Nadir
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हम
तो
बचपन
में
भी
अकेले
थे
सिर्फ़
दिल
की
गली
में
खेले
थे
Javed Akhtar
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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पहले
ये
काम
बड़े
प्यार
से
माँ
करती
थी
अब
हमें
धूप
जगाती
है
तो
दुख
होता
है
Munawwar Rana
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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ख़ुदा
के
घर
सड़क
कोई
नहीं
जाती
चलो
पैदल
वहाँ
लारी
नहीं
जाती
चली
जाती
है
हँसने
और
हँसाने
से
दवा
खाने
से
बीमारी
नहीं
जाती
ज़ियादा
सोचने
से
नींद
जाती
है
मगर
इस
सेे
परेशानी
नहीं
जाती
मुआफ़ी
माँ
ने
दे
दी
ख़्वाब
में
आकर
मगर
सर
से
पशेमानी
नहीं
जाती
उसे
जाने
दिया
रोका
नहीं
मैं
ने
कभी
उसकी
ये
हैरानी
नहीं
जाती
बढ़ाते
जाते
हैं
हर
रोज़
आबादी
मगर
शहरों
की
वीरानी
नहीं
जाती
मुहब्बत
हो
गई
तो
हो
गई
आतिश
कभी
ये
वाली
बीमारी
नहीं
जाती
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Aatish Indori
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फूल
जब
कुछ
किताब
से
निकले
ढेर
लम्हे
गुलाब
से
निकले
जिस्म
निकला
है
निकली
हैं
साँसें
हम
कहाँ
तेरे
ख़्वाब
से
निकले
ज़िंदगानी
की
झील
में
झाँका
ढेर
किरदार
आब
से
निकले
पूछ
कर
लग
रहा
है
ग़लती
की
प्रश्न
ढेरों
जवाब
से
निकले
इस
तरह
मेरी
मौत
को
टाला
धीरे
धीरे
नक़ाब
से
निकले
इक
नज़र
आपकी
गिरी
मुझ
पर
रात
दिन
सारे
ख़्वाब
से
निकले
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Aatish Indori
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मानता
हूँ
कि
मज़ा
ख़ूब
मुहब्बत
में
है
इस
से
भी
बढ़
के
मज़ा
यार
अदावत
में
है
Aatish Indori
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तिजोरी
तो
भरी
लेकिन
ठगाई
भी
की
उसने
वफ़ा
की
ढेर
लेकिन
बेवफ़ाई
भी
की
उसने
Aatish Indori
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तब
नया
साल
मैं
मनाऊँगा
जब
मेरे
फिर
से
तुम
हो
जाओगे
Aatish Indori
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