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Aatish Indori
phool jab kuchh kitaab se nikle
phool jab kuchh kitaab se nikle | फूल जब कुछ किताब से निकले
- Aatish Indori
फूल
जब
कुछ
किताब
से
निकले
ढेर
लम्हे
गुलाब
से
निकले
जिस्म
निकला
है
निकली
हैं
साँसें
हम
कहाँ
तेरे
ख़्वाब
से
निकले
ज़िंदगानी
की
झील
में
झाँका
ढेर
किरदार
आब
से
निकले
पूछ
कर
लग
रहा
है
ग़लती
की
प्रश्न
ढेरों
जवाब
से
निकले
इस
तरह
मेरी
मौत
को
टाला
धीरे
धीरे
नक़ाब
से
निकले
इक
नज़र
आपकी
गिरी
मुझ
पर
रात
दिन
सारे
ख़्वाब
से
निकले
- Aatish Indori
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चाँद
का
ख़्वाब
सजा
के
बैठे
हैं
घर
में
साँकल
लगा
के
बैठे
हैं
संग
को
ख़ुदा
बना
के
बैठे
हैं
धूप
में
दिया
जला
के
बैठे
हैं
मुक़ाबला
गेंदे
के
फूल
से
है
गुलाब
ख़ुद
को
सजा
के
बैठे
हैं
गहरी
काली
रात
बितानी
है
हम
तो
हिया
जला
के
बैठे
हैं
दिल
को
याद
उसकी
मत
दिलवाओ
मुश्किल
से
चुप
करा
के
बैठे
हैं
फ़ोन
कहाँ
आता
है
तुम्हारा
अब
ख़ुद
को
ख़ुद
ही
मना
के
बैठे
हैं
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जल्दी
बौरा
जाता
हूँ
अक्सर
धोका
खाता
हूँ
तू
तो
पहली
चाहत
थी
गीत
तेरे
ही
गाता
हूँ
रस्ता
कैसे
पाऊँगा
ख़ुद
में
जंगल
पाता
हूँ
पहली
बारिश
पहली
है
अब
तक
भीगा
जाता
हूँ
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मेरी
पहचान
इतनी
सी
है
बस
माँ
की
आँखों
का
लाड़ला
हूँ
मैं
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क्या
बताएँ
तुम्हें
कि
कितनी
पी
मापनी
में
ले
कर
के
थोड़ी
पी
हम
तो
हैं
असल
पीने
वाले
लोग
हम
नहीं
देखते
कि
कितनी
पी
जान-ए-जानाँ
नियम
नहीं
तोड़ा
जितनी
थी
हमने
उतनी
पूरी
पी
तेरा
हिस्सा
मैं
कैसे
पी
जाता
इसलिए
आधी
छोड़ी
आधी
पी
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मेरी
आँखों
ने
अब
तक
वीराने
देखे
हैं
मूमल
जैसे
दर्द
भरे
अफ़साने
देखे
हैं
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