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Shubham Rai 'shubh'
na jaane kaun si bayaar chal rahi
na jaane kaun si bayaar chal rahi | न जाने कौन सी बयार चल रही
- Shubham Rai 'shubh'
न
जाने
कौन
सी
बयार
चल
रही
ख़ुशी
की
ज़िंदगी
से
रार
चल
रही
बुढ़ा
गया
है
बाप
जो
बनाने
में
उसी
को
बांटने
में
मार
चल
रही
- Shubham Rai 'shubh'
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अँधेरों
में
भले
ही
साथ
छोड़ा
था
हमारा
मगर
जब
रौशनी
लौटी
तो
साए
लौट
आए
Vikas Sahaj
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कभी
हम
से
भी
कोई
बात
कीजे
हमें
भी
है
सलीक़ा
गुफ्तगू
का
Meem Alif Shaz
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तुम्हें
दिल
दे
तो
दे
'ताबाँ'
ये
डर
है
हमेशा
को
तुम्हारा
हो
न
जाए
Anwar Taban
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आग
अपने
ही
लगा
सकते
हैं
ग़ैर
तो
सिर्फ़
हवा
देते
हैं
Mohammad Alvi
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झुके
तो
जन्नत
उठे
तो
ख़ंजर
करेंगी
हम
को
तबाह
आँखें
Parul Singh "Noor"
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दिल
भी
तोड़ा
तो
सलीक़े
से
न
तोड़ा
तुम
ने
बे-वफ़ाई
के
भी
आदाब
हुआ
करते
हैं
Mehtab Alam
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ये
हम
ही
हैं
कि
किसी
के
अगर
हुए
तो
हुए
तुम्हारा
क्या
है
कोई
होगा
कोई
था
कोई
है
Irfan Sattar
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मैं
उस
को
देख
के
चुप
था
उसी
की
शादी
में
मज़ा
तो
सारा
इसी
रस्म
के
निबाह
में
था
Muneer Niyazi
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अब
तो
उतनी
भी
मुयस्सर
नहीं
मय-ख़ाने
में
जितनी
हम
छोड़
दिया
करते
थे
पैमाने
में
Divakar Rahi
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इश्क़
का
एजाज़
सज्दों
में
निहाँ
रखता
हूँ
मैं
नक़्श-ए-पा
होती
है
पेशानी
जहाँ
रखता
हूँ
मैं
Behzad Lakhnavi
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जागना
चाहता
हूँ
जगाओ
मुझे
ज़िंदगी
की
हक़ीक़त
बताओ
मुझे
भूलना
चाहता
हूँ
मैं
इक
शख़्स
को
नाम
से
उसके
तुम
मत
बुलाओ
मुझे
इक
न
इक
दिन
मुक़द्दर
बदल
जाएगा
मुफ़लिसी
इतना
तो
मत
सताओ
मुझे
बात
आई
है
कह
दो
ग़लत
कुछ
नहीं
यार
ग़लती
तो
मेरी
बताओ
मुझे
इन
भरी
आँख
कब
तक
पुकारूँ
तुझे
मौत
आकर
गले
से
लगाओ
मुझे
रात
भर
देखने
दो
हसीं
ख़्वाब
तुम
दिन
निकलते
भले
तुम
जलाओ
मुझे
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Shubham Rai 'shubh'
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हाथ
पकड़
कर
वो
जब
मुझको
अपने
पास
बुलाती
है
मन
पीछे
हो
जाता
है
धड़कन
मेरी
बढ़
जाती
है
कुछ
भी
बोलो
वो
हर
बात
पे
नख़रे
ख़ूब
दिखाती
है
इक
इक
ग़लती
को
मेरे
दिन
रात
मुझे
गिनवाती
है
दूर
रहूँ
जो
मैं
तो
मुझको
करके
फोन
बुलाती
है
पास
रहूँ
तो
नैनन
से
वो
मुझको
ख़ूब
सताती
है
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Shubham Rai 'shubh'
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दिन
फिरे
हैं
तो
मिलने
आए
हो
ये
मोहब्बत
मैं
सब
समझता
हूँ
तीरगी
में
न
साथ
था
कोई
भीड़
क्यूँँ
है
ये
अब
समझता
हूँ
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Shubham Rai 'shubh'
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मुँह
फेर
कर
के
जा
रहे
कुछ
बात
है
क्या
जानी
बहुत
शरमा
रहे
कुछ
बात
है
क्या
जो
लोग
तुम
सेे
दूर
रहते
थे
कभी
अब
वो
दोस्ती
समझा
रहे
कुछ
बात
है
क्या
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Shubham Rai 'shubh'
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ज़िंदा
नहीं
रहेगा
कोई
एक
रोज़
जाना
है
बैठे
नहीं
चलेगा
घर
कुछ
पैसा
भी
कमाना
है
ये
सोच
शहरस
निकला
था
यार
वो
मुसाफ़िर
भी
मुश्किल
समय
भले
आए
हर
हाल
मुस्कुराना
है
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