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Vikas Sahaj
andheron men bhale hi saath chhodaa tha hamaara
andheron men bhale hi saath chhodaa tha hamaara | अँधेरों में भले ही साथ छोड़ा था हमारा
- Vikas Sahaj
अँधेरों
में
भले
ही
साथ
छोड़ा
था
हमारा
मगर
जब
रौशनी
लौटी
तो
साए
लौट
आए
- Vikas Sahaj
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हमारे
लोग
अगर
रास्ता
न
पाएँगे
शिलाएँ
जोड़
के
पानी
पे
पुल
बनाएँगे
फिर
एक
बार
मनेगी
अवध
में
दीवाली
फिर
एक
बार
सभी
रौशनी
में
आएँगे
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Amit Jha Rahi
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यह
जानते
हैं
हम
या
ख़ुदा
जानता
है
बस
कैसे
निकल
के
आए
हैं
उस
तीरगी
से
हम
Amaan Pathan
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हर
इक
मकाँ
में
जला
फिर
दिया
दिवाली
का
हर
इक
तरफ़
को
उजाला
हुआ
दिवाली
का
Nazeer Akbarabadi
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ये
भँवरे
रौशनी
खो
देंगे
अपनी
आँखों
की
अगर
चमन
में
जो
कलियाँ
नक़ाब
ओढेंगी
Shajar Abbas
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मैं
तो
जस्सर
और
भी
रौशन
हुआ
जब
किसी
ने
भी
बुझाया
देर
तक
Avtar Singh Jasser
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सफ़र
में
धूप
तो
होगी
जो
चल
सको
तो
चलो
सभी
हैं
भीड़
में
तुम
भी
निकल
सको
तो
चलो
Nida Fazli
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ये
करिश्मा
हुआ
चूमने
से
उसे
तीरगी
पर
खुली
रोशनी
की
समझ
Neeraj Neer
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रिश्तों
को
जब
धूप
दिखाई
जाती
है
सिगरेट
से
सिगरेट
सुलगाई
जाती
है
Ankit Gautam
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अब
ऐसे
ज़ाविए
पर
लौ
रखी
जाने
लगी
है
चराग़ों
के
तले
भी
रोशनी
जाने
लगी
है
नया
पहलू
सलीक़े
से
बयाँ
करना
पड़ेगा
कहानी
अब
तवज्जोह
से
सुनी
जाने
लगी
है
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Khurram Afaq
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रोशनी
बढ़ने
लगी
है
शहर
की
चाँद
छत
पर
आ
गया
है
देखिए
Divy Kamaldhwaj
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उसकी
निगाह-ए-नाज़
से
आगे
निकल
गए
यानी
फ़रेब-साज़
से
आगे
निकल
गए
हम
से
भी
रोक
लेने
की
ज़हमत
नहीं
हुई
तुम
भी
हर
इक
लिहाज़
से
आगे
निकल
गए
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Vikas Sahaj
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टूटेंगे
सपने
शहज़ादी
तुमको
हैं
सहने
शहज़ादी
छोड़
महल
क्या
आ
पाओगी
हुजरे
में
रहने
शहज़ादी
हमने
जन्म
लिया
था
अब
की
बस
तुम
पर
मरने
शहज़ादी
हम
दोनों
को
छुप
कर
मिलते
देखा
है
सबने
शहज़ादी
बस
तुम
पर
ही
जँचते
हैं
ये
फूलों
के
गहने
शहज़ादी
क्या
तुमको
भी
ये
लगता
है
ग़लत
किया
हमने
शहज़ादी
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Vikas Sahaj
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उधारी
सर
से
ऊपर
बढ़
चुकी
है
हमारी
जान
जोखिम
में
पड़ी
है
हमीं
अपमान
सहकर
जी
रहे
हैं
अना
की
लाश
पंखे
पर
मिली
है
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Vikas Sahaj
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सजा
है
प्रेम
का
उपवन
तुम्हीं
से
हमारी
चाह
है
पावन
तुम्हीं
से
सभी
में
प्रेम
देखें
प्रेम
चाहें
मिली
है
ये
मुझे
चितवन
तुम्हीं
से
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Vikas Sahaj
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इसे
कैसे
करें
स्वीकार
मोहन
हमारी
हो
गई
है
हार
मोहन
समर्पित
ज़िंदगी
कर
दी
तुम्हें,
अब
तुम्हीं
इसका
करो
उद्धार
मोहन
निरन्तर
लड़
रहे
हैं
हम
सभी
से
हमें
भी
तो
सिखाओ
प्यार
मोहन
हमारी
राधिका
हमको
पुकारे
कभी
ये
स्वप्न
हो
साकार
मोहन
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Vikas Sahaj
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