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Shubham Rai 'shubh'
munh fer kar ke ja rahe kuchh baat hai kya
munh fer kar ke ja rahe kuchh baat hai kya | मुँह फेर कर के जा रहे कुछ बात है क्या
- Shubham Rai 'shubh'
मुँह
फेर
कर
के
जा
रहे
कुछ
बात
है
क्या
जानी
बहुत
शरमा
रहे
कुछ
बात
है
क्या
जो
लोग
तुम
सेे
दूर
रहते
थे
कभी
अब
वो
दोस्ती
समझा
रहे
कुछ
बात
है
क्या
- Shubham Rai 'shubh'
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ग़ज़ल
की
चूड़ियाँ
लेकर
जहाँ
तुम
जा
रहे
हो
दोस्त
वहाँ
हर
शख़्स
के
हाथों
में
बस
सोने
के
कंगन
हैं
Saarthi Baidyanath
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एक
आवाज़
कि
जो
मुझको
बचा
लेती
है
ज़िन्दगी
आख़री
लम्हों
में
मना
लेती
है
जिस
पे
मरती
हो
उसे
मुड़
के
नहीं
देखती
वो
और
जिसे
मारना
हो
यार
बना
लेती
है
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Ali Zaryoun
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उसको
जो
कुछ
भी
कहूँ
अच्छा
बुरा
कुछ
न
करे
यार
मेरा
है
मगर
काम
मेरा
कुछ
न
करे
दूसरी
बार
भी
पड़
जाए
अगर
कुछ
करना
आदमी
पहली
मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
न
करे
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Abid Malik
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रात
दिन
तेरे
साथ
कटते
थे
यार
अब
तुझ
सेे
बात
से
भी
गए
ये
मोहब्बत
भी
किन
दिनों
में
हुई
दिल
मिलाने
थे
हाथ
से
भी
गए
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Kafeel Rana
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ग़रज़
कि
काट
दिए
ज़िंदगी
के
दिन
ऐ
दोस्त
वो
तेरी
याद
में
हों
या
तुझे
भुलाने
में
Firaq Gorakhpuri
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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कल
रात
मैं
बहुत
ही
अलग
सा
लगा
मुझे
उसकी
नज़र
ने
यूँँ
मेरी
सूरत
खंगाली
दोस्त
Afzal Ali Afzal
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हम
को
यारों
ने
याद
भी
न
रखा
'जौन'
यारों
के
यार
थे
हम
तो
Jaun Elia
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ख़ुद
को
शीशा
कर
लिया
है
यार
मैंने
अब
तो
तेरा
देखना
बनता
है
मुझ
को
Neeraj Neer
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तिरे
लबों
में
मिरे
यार
ज़ाइक़ा
नहीं
है
हज़ार
बोसे
हैं
उन
पर
प
इक
दु'आ
नहीं
है
Pallav Mishra
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निगह
में
मुझे
जिसके
आना
नहीं
था
जहाँ
आना
था
ये
ज़माना
नहीं
था
बिताता
रहा
ज़िंदगी
जिस
तरह
से
मुझे
इस
तरह
से
बिताना
नहीं
था
सता
जो
रही
है
मोहब्बत
मुझे
अब
कि
कल
कह
रही
दिल
लगाना
नहीं
था
ख़ता
इतनी
बस
कर
गया
दिल-लगी
में
तुम्हीं
दिल-नशीं
हो
जताना
नहीं
था
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Shubham Rai 'shubh'
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मुहब्बत
में
कई
ऐसे
भी
सौदे
कर
गया
हूँ
मैं
हक़ीक़त
जान
के
जिसकी
बहुत
ही
डर
गया
हूँ
मैं
मिला
जो
भी
भरोसा
कर
लिया
उस
पे
ऐ
जान-ए-जाँ
नहीं
करना
था
जो
मुझको
वही
तो
कर
गया
हूँ
मैं
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Shubham Rai 'shubh'
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दिल
लगाओ
अबकी
तुम,
हिजरत
करेंगे
हम
फिर
बताना
दर्द
मीठा
है
कि
कड़वा
है
Shubham Rai 'shubh'
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मोहब्बत
में
अगर
चलती
सिफ़ारिश
मियाँ
हम
आशिक़-ए-बदनाम
होते
Shubham Rai 'shubh'
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क़बीले
के
अपने
वफ़ादार
तुम
हो
हो
जनता
की
हामी
या
इनकार
तुम
हो
हक़ीक़त
क़लम
से
निकलती
नहीं
है
ख़रीदा
हुआ
जैसे
अख़बार
तुम
हो
दिखाओगे
तुम
तो
धमक
रंगदारी
है
नेता
सभी
गुंडे
सरकार
तुम
हो
दिखाकर
के
सपने
जो
काटी
हैं
ज़ेबें
गरीबों
के
कैसे
मददगार
तुम
हो
ग़नीमत
है
हम
बोल
देते
हैं
वर्ना
भगत
सब
तुम्हारे
निराकार
तुम
हो
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Shubham Rai 'shubh'
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