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Shubham Rai 'shubh'
khoob pyaara kinaara ho saka hai
khoob pyaara kinaara ho saka hai | ख़ूब प्यारा किनारा हो सकता है
- Shubham Rai 'shubh'
ख़ूब
प्यारा
किनारा
हो
सकता
है
एक
तिनका
सहारा
हो
सकता
है
आज
ईमान
का
माने
वा'दा
है
क़ौल
उसके
गुज़ारा
हो
सकता
है
- Shubham Rai 'shubh'
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मोहब्बत
की
तो
कोई
हद,
कोई
सरहद
नहीं
होती
हमारे
दरमियाँ
ये
फ़ासले,
कैसे
निकल
आए
Khalid Moin
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प्यार
करने
की
हिम्मत
नहीं
उनके
पास
और
हम
सेे
किनारा
भी
होता
नहीं
बात
सीधे
कही
भी
नहीं
जा
रही
और
कोई
इशारा
भी
होता
नहीं
उसको
उम्मीद
है
ऐश
होगी
बसर
साथ
में
जब
रहेगी
मिरे
वो
मगर
मुझपे
जितनी
मुहब्बत
बची
है
सखी
इतने
में
तो
गुज़ारा
भी
होता
नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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लहू
वतन
के
शहीदों
का
रंग
लाया
है
उछल
रहा
है
ज़माने
में
नाम-ए-आज़ादी
Firaq Gorakhpuri
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पारा-ए-दिल
है
वतन
की
सर
ज़मीं
मुश्किल
ये
है
शहर
को
वीरान
या
इस
दिल
को
वीराना
कहें
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Majrooh Sultanpuri
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मुसलसल
तजरबों
का
है
नतीजा
मैं
दरया
से
किनारा
हो
गया
हूँ
Madan Mohan Danish
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वतन
की
ख़ाक
ज़रा
एड़ियाँ
रगड़ने
दे
मुझे
यक़ीन
है
पानी
यहीं
से
निकलेगा
Unknown
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बाज़
बनना
है
तो
फिर
कद
भूल
जा
आँख
में
रख
लक्ष्य
और
हद
भूल
जा
किसलिए
डरता
है
दीवारों
से
तू
आ
समाँँ
को
देख
सरहद
भूल
जा
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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तुम
भला
उस
प्रेम
की
गहराई
क्या
समझोगे
जानाँ
जो
कभी
ख़्वाबों
में
भी
अपनी
न
सरहद
लाँघता
है
Harsh saxena
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ज़बाँ
हमारी
न
समझा
यहाँ
कोई
'मजरूह'
हम
अजनबी
की
तरह
अपने
ही
वतन
में
रहे
Majrooh Sultanpuri
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यही
मौक़ा
है
दिल
को
हार
जाने
का
दिखेगा
दर्द
तब
सारे
ज़माने
का
न
उम्मीदी
दिखेगी
सामने
तुमको
करेगा
मन
कि
बस
जीवन
गँवाने
का
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Shubham Rai 'shubh'
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वो
चमत्कार
बहुत
करता
है
भक्त
से
प्यार
बहुत
करता
है
राम
का
नाम
ही
उत्तम
है
जो
सबका
उद्धार
बहुत
करता
है
पाप
भी
मिटने
से
पहले
अपने
कद
का
विस्तार
बहुत
करता
है
दाग़
लग
जाए
अगर
दामन
पर
जीना
दुश्वार
बहुत
करता
है
बात-बे-बात
को
मनवाने
में
तर्क
संसार
बहुत
करता
है
हार
तो
मुश्किलें
लाती
है
फिर
ख़्वाब
साकार
बहुत
करता
है
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Shubham Rai 'shubh'
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आए
हो
तो
आओ
बैठो
कुछ
पल
साथ
बिताओ
बैठो
कुछ
भूखे
से
तुम
लगते
हो
साथ
हमारे
खाओ
बैठो
छोड़ो
बात
पुरानी
अब
तुम
कैसे
हो
हाल
सुनाओ
बैठो
पिछले
बेंच
सा
कोई
जादू
फिर
दिखलाओ
आओ
बैठो
यार
कहाँ
तुम
रहते
हो
कुछ
तो
बोलो
बतलाओ
बैठो
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Shubham Rai 'shubh'
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फँसी
कश्ती
हमारी
है
दुखों
का
बोझ
भारी
है
सँभल
कर
चल
रहा
हूँ
जो
दया
गिरधर
तुम्हारी
है
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Shubham Rai 'shubh'
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अलग
जाए
ज़माना
तो
हमें
क्या
ग़म
बहक
जाए
दिवाना
तो
हमें
क्या
ग़म
घमंडी
है,
फ़रेबी
है,
छली
है
वो
नहीं
है
दोस्ताना
तो
हमें
क्या
ग़म
मिले
सब
कुछ
मगर
वो
अब
नहीं,
चाहे
पड़े
सब
कुछ
लुटाना
तो
हमें
क्या
ग़म
निकाला
है
उसे
अब
बा-ख़बर
होकर
नहीं
है
दिल
लगाना
तो
हमें
क्या
ग़म
ख़ुशी
से
लिख
रही
है
ये
क़लम
अब
शुभ
नहीं
अपना
ठिकाना
तो
हमें
क्या
ग़म
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Shubham Rai 'shubh'
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