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Shubham Rai 'shubh'
ik kahaanii ke lekhak rahe umr bhar
ik kahaanii ke lekhak rahe umr bhar | इक कहानी के लेखक रहे उम्र भर
- Shubham Rai 'shubh'
इक
कहानी
के
लेखक
रहे
उम्र
भर
इक
कहानी
में
मुझको
भी
मारा
गया
दर्द
भी
बाँटते
हम
किसी
से
मगर
बीच
अपनों
के
सिर
को
उतारा
गया
- Shubham Rai 'shubh'
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एक
दिन
की
ख़ुराक
है
मेरी
आप
के
हैं
जो
पूरे
साल
के
दुख
Varun Anand
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अब
लगता
है
ठीक
कहा
था
'ग़ालिब'
ने
बढ़ते
बढ़ते
दर्द
दवा
हो
जाता
है
Madan Mohan Danish
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आह
को
चाहिए
इक
उम्र
असर
होने
तक
कौन
जीता
है
तिरी
ज़ुल्फ़
के
सर
होने
तक
Mirza Ghalib
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मैं
अँधेरों
से
बचा
लाया
था
अपने
आप
को
मेरा
दुख
ये
है
मिरे
पीछे
उजाले
पड़
गए
Rahat Indori
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बोसा
होंटों
का
मिल
गया
किस
को
दिल
में
कुछ
आज
दर्द
मीठा
है
Muneer Shikohabadi
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रात
भर
दर्द
की
शम्अ
जलती
रही
ग़म
की
लौ
थरथराती
रही
रात
भर
Makhdoom Mohiuddin
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सारे
दुख
सो
जाएँगे
लेकिन
इक
ऐसा
ग़म
भी
है
जो
मिरे
बिस्तर
पे
सदियों
का
सफ़र
रख
जाएगा
Azm Shakri
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जो
सारे
ज़ख़्म
मेरे
भर
दिया
करता
उसी
के
नाम
का
ख़ंजर
बनाया
है
Parul Singh "Noor"
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हमारी
उम्र
के
लड़के
ग़ज़ल
तो
लिख
रहे
हैं
पर
ये
इतना
दर्द
लेके
जी
रहे
हैं
ठीक
थोड़ी
है
Ramesh Singh
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कभी
सहर
तो
कभी
शाम
ले
गया
मुझ
से
तुम्हारा
दर्द
कई
काम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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यही
मौक़ा
है
दिल
को
हार
जाने
का
दिखेगा
दर्द
तब
सारे
ज़माने
का
न
उम्मीदी
दिखेगी
सामने
तुमको
करेगा
मन
कि
बस
जीवन
गँवाने
का
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Shubham Rai 'shubh'
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आँखों
में
तू
सैलाब
आने
दे
आज
उस
प्रेयसी
को
भी
भुलाने
दे
आज
सब
सेे
तबीअत
से
मिलूँगा
ऐ
दोस्त
थोड़ी
ख़ुशी
उनको
मनाने
दे
आज
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Shubham Rai 'shubh'
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अना
पर
बात
आए
लहरों
को
भी
मोड़
दूँगा
कटे
गर्दन
भले
तेरी
अकड़
मैं
तोड़
दूँगा
रहूँगा
शान
से
चाहे
खड़ी
हो
मौत
सम्मुख
झुकाऊँगा
न
सर
अपना
ये
साँसें
छोड़
दूँगा
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Shubham Rai 'shubh'
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कहानी
अपनी
जो
इक
मसख़रा
सुनाने
लगा
कि
बैठे
लोगों
के
आँखों
में
आँसू
आने
लगा
Shubham Rai 'shubh'
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करूँँगा
मैं
क्या
अब
बताता
नहीं
हूँ
सो
अब
पीठ
पर
ज़ख़्म
खाता
नहीं
हूँ
सभी
लूट
जाए
भले
आज
कल
पर
किसी
दर
पे
मैं
सर
झुकाता
नहीं
हूँ
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