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Shubham Rai 'shubh'
chahe jitni raah men aa jaa.e mushkil
chahe jitni raah men aa jaa.e mushkil | चाहे जितनी राह में आ जाए मुश्किल,
- Shubham Rai 'shubh'
चाहे
जितनी
राह
में
आ
जाए
मुश्किल,
ख़्वाब
को
मेरे
मुक्कमल
तो
करूँँगा
- Shubham Rai 'shubh'
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कभी
किसी
न
किसी
राह
पर
मिलेंगे
फिर
हम
एक
से
ही
ख़यालात
पेश
करते
हुए
shaan manral
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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जो
तुम्हें
मंज़िल
पे
ले
जाएँगी
वो
राहें
अलग
हैं
मैं
वो
रस्ता
हूँ
कि
जिस
पर
तुम
भटक
कर
आ
गई
हो
Harman Dinesh
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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मेरी
जानिब
न
बढ़ना
अब
मोहब्बत
मैं
अब
पहले
से
मुश्किल
रास्ता
हूँ
Liaqat Jafri
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हम
जान
से
जाएँगे
तभी
बात
बनेगी
तुम
से
तो
कोई
राह
निकाली
नहीं
जाती
Wasi Shah
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अब
ज़िन्दगी
से
कोई
मिरा
वास्ता
नहीं
पर
ख़ुद-कुशी
भी
कोई
सही
रास्ता
नहीं
Rahul
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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जब
भी
उस
कूचे
में
जाना
पड़ता
है
ज़ख़्मों
पर
तेज़ाब
लगाना
पड़ता
है
उसके
घर
से
दूर
नहीं
है
मेरा
घर
रस्ते
में
पर
एक
ज़माना
पड़ता
है
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Subhan Asad
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ज़रा
सी
देर
को
सकते
में
आ
गए
थे
हम
कि
एक
दूजे
के
रस्ते
में
आ
गए
थे
हम
जो
अपना
हिस्सा
भी
औरों
में
बाँट
देता
है
एक
ऐसे
शख़्स
के
हिस्से
में
आ
गए
थे
हम
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Ismail Raaz
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न
जाने
कौन
सी
बयार
चल
रही
ख़ुशी
की
ज़िंदगी
से
रार
चल
रही
बुढ़ा
गया
है
बाप
जो
बनाने
में
उसी
को
बांटने
में
मार
चल
रही
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Shubham Rai 'shubh'
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तुम
नए
नेता
बने
हो
या
गली
तुम
भूल
आए
हो
फेंकने
को
कौन
सा
जुमला
नया
इस
बार
लाए
हो
Shubham Rai 'shubh'
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डरावनी
है
जो
तुझ
को
तिरी
क़ज़ा
ही
न
हो
न
भाग
इतना
कि
अंजाम
का
पता
ही
न
हो
दिखावे
की
होड़
में
क्या
मिले
नहीं
आप
से
दिखा
रहे
जैसे
कुछ
भी
अता
पता
ही
न
हो
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Shubham Rai 'shubh'
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थाम
लो
जो
हाथ
तो
सँभल
सकता
हूॅं
साथ
तेरे
मीलों
तक
चल
सकता
हूॅं
ता'रीफ़ें
जो
करे
तो
इठलाना
मत
वरना
मैं
भी
बात
बदल
सकता
हूॅं
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Shubham Rai 'shubh'
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क़बीले
के
अपने
वफ़ादार
तुम
हो
हो
जनता
की
हामी
या
इनकार
तुम
हो
हक़ीक़त
क़लम
से
निकलती
नहीं
है
ख़रीदा
हुआ
जैसे
अख़बार
तुम
हो
दिखाओगे
तुम
तो
धमक
रंगदारी
है
नेता
सभी
गुंडे
सरकार
तुम
हो
दिखाकर
के
सपने
जो
काटी
हैं
ज़ेबें
गरीबों
के
कैसे
मददगार
तुम
हो
ग़नीमत
है
हम
बोल
देते
हैं
वर्ना
भगत
सब
तुम्हारे
निराकार
तुम
हो
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Shubham Rai 'shubh'
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